शैक्षिक डकैती के अड्डे बन गए स्कूल और पुस्तक विक्रेता, निजी स्कूलों की मनमानी जारी, अभिभावकों पर थोपा जा रहा भारी-भरकम बोझ 

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Published By Anjali Singh
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लखनऊ, अमृत विचार: नए शिक्षा सत्र में निजी स्कूलों ने प्रवेश व अन्य शुल्क में तीन से 27 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी तो कर ही दी है, किताबों के साथ स्टेशनरी व काॅपियां खरीदने के नाम पर लूटा जा रहा है। स्कूलों की तय दुकानों पर मनमाने दामों पर किताबें, स्टेशनरी और कॉपियां दी जा रही हैं। कॉपियां व स्टेशनरी न देने पर किताबें देने से मना कर दिया जाता है। नीलमथा निवासी प्रिंस लेनिन ने से इसी बात पर पुस्तक विक्रेता से विवाद हो गया तो मामला पीजीआई थाने तक पहुंच गया।

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नीलमथा निवासी प्रिंस लेनिन ने बताया कि उनके दो बच्चे वृंदावन सेक्टर 9 स्थित लखनऊ पब्लिक स्कूल में कक्षा 7 व 3 में पढ़ते हैं। इस स्कूल की पुस्तकें जिस बुकस्टॉल पर मिल रही हैं, वहां किताबों के साथ जबरिया कॉपी और स्टेशनरी दी जा रही है। इसी बात पर विवाद हो गया था।उन्होंने आरोप लगाया कि निजी स्कूलों में साल-दर-साल शिक्षण शुल्क में बढोत्तरी तो कर ही रहे हैं, एक्सट्रा कॅरिकूलर एक्टिविटीज के नाम पर भी पैसे वसूले जाते हैं।

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बड़े स्कूलों की वेबसाइट पर प्री-प्राइमरी से लेकर सीनियर सेक्शन तक में प्रवेश शुल्क से लेकर वार्षिक कंपोजिट शुल्क में तीन से 27 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिख रही है। लखनऊ पब्लिक स्कूल, गोमती नगर फीस वृद्धि के मामले में सबसे आगे हैं। इनमें प्री-प्राइमरी में 18 प्रतिशत, प्राइमरी में 22 प्रतिशत, जूनियर सेक्शन में 25 प्रतिशत और सीनियर सेक्शन में 27 प्रतिशत तक शुल्क बढ़ा दिया गया है। दूसरे स्थान पर सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल, तीसरे पर डीपीएस और चौथे स्थान पर जीडी गोयनका स्कूल एवं सिटी मोन्टेसरी स्कूल हैं। इनमें अपेक्षाकृत सबसे कम फीस वृद्धि की गई है।

क्या है नियम

फीस निर्धारण अधिनियम-2018 के अनुसार विद्यालय अपनी फीस में ‘‘पिछले वर्ष की महंगाई दर के साथ 5 प्रतिशत’’ तक वृद्धि कर सकते हैं। चूंकि सांख्यिकी व कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स एण्ड प्रोग्राम इम्प्लीमेन्टेशन) के अनुसार पिछले 12 महीनों का औसत महंगाई दर के हिसाब से ही फीस वृद्धि होनी चाहिए। यदि कोई भी स्कूल किताबों के लिए किसी एक दुकान से ही लेने के लिए बाध्य करता है, तो अभिभावक उनकी लिखित शिकायत संबंधित जनपद के जिला विद्यालय निरीक्षक से कर सकते हैं।

परिषदीय विद्यालयों में पढ़ाई के स्तर में काफी सुधार हुआ है। एजुकेटर की भर्ती हुई है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत खेल-खेल में शिक्षा देने का काम कर रहे है। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अपने बच्चों का नाम लिखाना चाहिए।-रिंकी सिंह, शिक्षिका

प्राइवेट स्कूलों और कोचिंग की मनमानी लूट, पुस्तक विक्रेताओं की मनमानी लूट का मुख्य कारण सरकार की उदासीनता है। किताबों का और यूनिफॉर्म का हर वर्ष बदल जाना इसका जीता जागता उदाहरण है। मात्र 200 रुपए में छपने वाली किताब 2000 में बेची जा रही हैं जो की शोषण के दायरे में आता है। स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर लूट का अड्डा बन गए है।-महेंद्र प्रताप सिंह, अध्यक्ष, अभिभावक संघ

अक्सर घरों में छोटे भाई-बहन अपने बड़े भाई-बहनों की किताबों से पढ़ते हैं। किताबों के बार-बार बदलने से यह परंपरा खत्म हो गई है, जिससे शिक्षा अब एक ''महंगा व्यापार'' लगने लगी है।-विश्वास सिंह, अभिभावक

किताबों और ड्रेस को लेकर अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बनाना अत्यंत चिंताजनक है। सीमित दुकानों से ही पुस्तक खरीदने की बाध्यता प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर देती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं और अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह खुली लूट है जो बिना किसी हथियार के की जा रही है।-अनिल यादव, प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश बीटीसी शिक्षक संघ

किताबों का बार-बार बदलना शिक्षा को एक ''सेवा'' के बजाय ''धंधा'' बनाने जैसा है। इससे यह आभास होता है कि ज्ञान से अधिक महत्व किताबों की बिक्री को  दिया जा रहा है।-कृष्ण कुमार सोनी, महासचिव, अभिभावक संघ

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