मॉय फर्स्ट राइड : पापा के साथ सड़क पर आत्मविश्वास की उड़ान
आत्म सशक्तिकरण का एक माध्यम गाड़ी चलाना भी है। साधारण रूप से इसे मात्र एक आवश्यकता की श्रेणी में रखा जा सकता है, किंतु महिलाओं के लिए यह इससे बढ़कर है। जब मैंने गाड़ी चलाना सीखा था, तब मेरा पहला अनुभव भी खास था। मैंने गाड़ी चलाना अपने पिता से सीखा था, जब मैं कक्षा-12 की छात्रा थी। मुझे आज भी याद है, एक शांत सी सुबह थी। मैंने पापा से सकुचाते हुए कहा कि पापा मुझे कार चलाना सिखाना है। पापा ने मेरी इस बात को खुशी-खुशी स्वीकार किया और कहा यह बहुत अच्छी बात है।
अगली सुबह पापा मुझे पास के खाली मैदान में ले गए। शुरुआत आसान नहीं थी। कभी क्लच जल्दी छोड़ देती, तो गाड़ी झटके से बंद हो जाती। कभी ब्रेक और एक्सीलेटर में गड़बड़ हो जाती। मैं परेशान हो जाती, लेकिन पापा कभी नाराज नहीं हुए। वे हर गलती को धैर्य से समझाते और कहते,“गलतियां ही हमें बेहतर बनाती हैं।” धीरे-धीरे मेरी पकड़ मजबूत होती गई। हर दिन थोड़ी-थोड़ी प्रैक्टिस के साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा। पापा हमेशा बगल में बैठकर मुझे दिशा देते, लेकिन उन्होंने कभी मुझे पूरी तरह अपने ऊपर निर्भर नहीं होने दिया। वे चाहते थे कि मैं खुद फैसले लेना सीखूं।
ऐसे पापा मुझे धीरे-धीरे मैदान में कार चलाना सिखा दिया। फिर कुछ दिन बाद पापा ने कहा आज रोड पर गाड़ी चलाओ। ये सुनकर मैं घबरा गई। मैंने घबराते हुए कहा,“पापा, मुझसे नहीं होगा।” उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “तुम कर सकती हो, बस खुद पर भरोसा रखो।” उनकी आवाज में इतना विश्वास था कि मेरा डर धीरे-धीरे कम होने लगा। फिर मैं अगली सुबह रोड पर गाड़ी लेकर निकली। पापा साथ में थे। मुझे देखकर रास्ते में छोटी-छोटी बच्चियां खुश हो रही थीं और जैसे कुछ महिलाओं को देखकर मैं सोचती थी कि मैं एक दिन ऐसे ही गाड़ी चलाऊंगी, वैसा ही कोई सपना उनकी आंखों में चमकता हुआ मुझे दिखा। गाड़ी महिलाएं चलाएं या पुरुष इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक बेसिक लाइफ स्किल है, जो हर किसी को आनी चाहिए।
गाड़ी चलाना मात्र आवश्यकता नहीं है, कई बार जब दुनियाभर की चिताओं में व्यक्ति घिरा होता है, तो एक छोटी सी राइड से दोबारा फ्रेश हो जाता है। घर का सामान लाना हो या कहीं दूर जाना हो, अगर गाड़ी चलाना आता है, तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है। यह अनुभव मेरे लिए हमेशा खास रहेगा, क्योंकि इसमें सिर्फ ड्राइविंग नहीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण सबक छिपे हैं। पापा की सीट से शुरू हुआ यह सफर आज मेरी अपनी ड्राइव बन चुका है। -अदिति शुक्ला, बरेली
