जॉब का पहला दिन: सपनों से हकीकत तक पहला कदम

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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जीवन के कालखंड में कुछ तिथियां स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो जाती हैं। 25 मार्च 1995 का दिन मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय दिन है। इसी दिन मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की अमायन शाखा, जिला भिंड (मध्य प्रदेश) में अपनी पहली नौकरी की शुरुआत की और अपने करियर की पहली औपचारिक दहलीज लांघी। एक 22 वर्षीय युवा के लिए यह दिन उत्साह, गर्व और हल्की-सी बेचैनी का अनूठा संगम था। यह केवल नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि मेरे सपनों, संघर्षों और आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला ठोस कदम था।

सुबह का समय अलग ही उत्साह और घबराहट से भरा हुआ था। मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे- कैसा होगा नया कार्यस्थल, कैसे होंगे सहकर्मी, क्या मैं अपनी जिम्मेदारियों को निभा पाऊंगा? इन सवालों के बीच एक आत्मविश्वास भी था, जो मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। प्रातः 10 बजे मैं अपने बड़े भाई अरविंद त्रिवेदी जी के साथ बैंक पहुंचा। उस समय मन में हजारों विचार उमड़ रहे थे। परिवार के संस्कार और बैंक की साख, दोनों का सम्मान मेरे कंधों पर था। मार्च का महीना बैंकिंग क्षेत्र में ‘क्लोजिंग’ का समय होता है, इसलिए वातावरण में विशेष व्यस्तता और ऊर्जा थी। जब मैंने शाखा प्रबंधक एस. सोनवणे जी को अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट सौंपी, तो वह क्षण केवल पदभार ग्रहण करना नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज सेवा का संकल्प भी था। शाखा का वातावरण अनुशासन और कार्यकुशलता से परिपूर्ण था। वरिष्ठ कर्मचारियों आजाद जी, एस.एस. कुशवाहा और आनंद पाल ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। उनकी सरलता और सहयोगपूर्ण व्यवहार ने मेरी झिझक को काफी हद तक दूर कर दिया।

मुझे बैंक के विभिन्न कार्यों जमा-निकासी, खातों का संचालन और ग्राहकों से संवाद के बारे में बताया गया। लेजर, वाउचर और कैश ट्रांजैक्शन जैसी बैंकिंग प्रक्रियाओं से मेरा परिचय उसी दिन प्रारंभ हुआ। यह सब नया था, किंतु सीखने की ललक ने हर चुनौती को सरल बना दिया। अमायन जैसे ग्रामीण क्षेत्र में बैंक केवल वित्तीय संस्था नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे का केंद्र होता है। पहले ही दिन मुझे समझ आ गया कि यहां काम केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि लोगों की उम्मीदों का है।

उस समय सारा कार्य हस्तलिखित रजिस्टरों में होता था। एक छोटी सी चूक भी बड़ा अंतर उत्पन्न कर सकती थी, इसलिए एकाग्रता अत्यंत आवश्यक थी। मुझे मुख्यतः निरीक्षण और समझने का कार्य सौंपा गया। मैंने ध्यानपूर्वक हर प्रक्रिया को देखा और समझने का प्रयास किया। दोपहर में सहकर्मियों के साथ हुई अनौपचारिक बातचीत ने मुझे एक टीम का हिस्सा होने का एहसास कराया। उसी दिन यह भी समझ आया कि बैंक की नौकरी केवल ‘दस से पांच’ की ड्यूटी नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है।

सहकर्मियों का सहयोग मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा। उन्होंने धैर्यपूर्वक हर बात समझाई, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। दिन के अंत में जब सहकर्मी आनंद ने मुझे रहने और खाने की व्यवस्था में सहयोग का प्रस्ताव दिया, तो मन भावुक हो उठा। मुझे लगा कि मैंने अपने जीवन की एक नई यात्रा आरंभ कर दी है। इस दिन ने मुझे जिम्मेदारी, अनुशासन और समर्पण का महत्व सिखाया।

बाद में, 13 मई 1996 को उत्तर प्रदेश पीसीएस में चयनित होने के बाद, लगभग चौदह महीने की सेवा के पश्चात मैंने बैंक की नौकरी छोड़ दी। किंतु बैंक में बिताया गया पहला दिन आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है। उस दिन ने जो अनुभव और सीख दी, वह जीवन के हर पड़ाव पर मेरे साथ रही। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में बिताया गया समय मेरे व्यक्तित्व के निर्माण की नींव बना और उसी दिन ने मुझे आगे बढ़ने का साहस दिया।-अजय त्रिवेदी, उप निदेशक युवा कल्याण