कागजी आंकड़ों से नहीं बचेगा जीवन : हाईकोर्ट ने चेताया-वेंटिलेटर नहीं तो रिकॉर्ड किस काम के?
लखनऊ, अमृत विचार : हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा है कि यदि मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर उपलब्ध ही नहीं हो पा रहे हैं, तो वेंटिलेटरों की संख्या के संबंध में प्रस्तुत आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा है कि चिकित्सा सुविधाओं के लिए कुल बजट का कितना हिस्सा आवंटित किया गया है और अस्पतालों में सुविधाओं की स्थिति क्या है। मामले की अगली सुनवायी 25 मई को होगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने वी द पीपल संस्था की ओर से दाखिल याचिका पर दिया है। न्यायालय ने कहा कि प्रश्न यह है कि क्या कोई भी अस्पताल इस स्थिति में है कि वह शपथपत्र पर यह कह सके कि जब भी किसी मरीज को वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है, तो अस्पताल उसे उचित समय के भीतर वेंटिलेटर उपलब्ध करा देगा और यदि ऐसा नहीं है, तो शपथपत्र में दिए गए आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, प्रयास यह होना चाहिए कि पर्याप्त संख्या में वेंटिलेटर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वेंटिलेटर की अनुपलब्धता के कारण किसी की मृत्यु न हो।
न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रस्तुत आंकड़े इस पहलू पर संतोषजनक नहीं हैं, वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में यह निर्धारित करने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि अस्पताल में वेंटिलेटर की मांग क्या है और जीवन बचाने हेतु कितने वेंटिलेटर उपलब्ध होने चाहिए, जब तक यह व्यवस्था विकसित नहीं की जाती, तब तक इस प्रकार के आंकड़े देना निरर्थक होगा। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार इस पूरे विषय पर पुनर्विचार करे और सिर्फ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों जैसे कि अस्पतालों में कुल बेड का 10 से 15 प्रतिशत वेंटिलेटर की उपलब्धता से संतुष्ट न रहे।
न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने निजी अस्पतालों व क्लिनिकों के नियमन तथा उनकी फीस और सेवाओं की निगरानी व्यवस्था की जानकारी भी मांगी। न्यायालय ने कहा कि सरकार यह भी स्पष्ट करे कि क्या किसी कानून, नियम या अन्य किसी प्रावधान के तहत निजी अस्पतालों और क्लिनिकों के संचालन को नियंत्रित करने के लिए कोई नियामक व्यवस्था है, विशेषकर मरीजों के उपचार के लिए वसूले जाने वाले शुल्क के संबंध में।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल केवल लखनऊ तक सीमित न रहें, बल्कि अन्य जिलों में भी विकसित किए जाएं। सरकारी डॉक्टरों के कम वेतन के कारण उनके निजी क्षेत्र में जाने की प्रवृत्ति पर भी कोर्ट ने चिंता जताई। कहा कि सरकारी डॉक्टरों को दिए जा रहे वेतन की पर्याप्तता का प्रश्न भी विचारणीय है, विशेषकर निजी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को दिए जा रहे वेतन की तुलना में। यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में कम वेतन के कारण अनेक डॉक्टर निजी अस्पतालों की ओर पलायन कर जाते हैं, जिससे आम नागरिक उनके अनुभव और सेवाओं से वंचित रह जाते हैं।
