संपादकीय:भ्रामक युद्ध विराम
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका द्वारा युद्ध विराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ाना पहली नजर में शांति का संकेत लगता है, पर गहराई से देखें तो यह एक जटिल सामरिक चाल अधिक प्रतीत होती है। इतिहास गवाह है कि युद्ध विराम अक्सर संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि रणनीतिक विराम होता है। यह पुनर्संयोजन, दबाव निर्माण और कूटनीतिक संभावनाओं की परख का समय होता है। अमेरिका की मंशा को केवल शांति स्थापना तक सीमित मानना यथार्थवादी नहीं होगा, दरअसल यह कदम तीन स्तरों पर काम करता दिखता है— पहला, सैन्य थकान और संसाधनों के पुनर्गठन की आवश्यकता; दूसरा, अंतर्राष्ट्रीय दबाव को संतुलित करना और तीसरा, ईरान को वार्ता की मेज पर लाने के लिए समय खरीदना।
ईरान का यह दावा कि डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल युद्ध जारी रखने की स्थिति में नहीं हैं, इसे पूर्ण सत्य मानना तथ्य उपेक्षा और जल्दबाजी होगी। सवाल अमेरिका की सैन्य क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक प्राथमिकताओं और घरेलू दबावों पर अधिक हैं। अमेरिका का पाकिस्तान के कहने पर युद्ध विराम बढ़ाने का तर्क भी अधिक विश्वसनीय नहीं लगता है। पाकिस्तान इस क्षेत्र में एक कारक अवश्य है, पर निर्णायक नहीं। अमेरिका के फैसले आमतौर पर उसके व्यापक भू-राजनीतिक हितों—विशेषकर ऊर्जा, इसराइल की सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व से संचालित होते हैं।
इस संदर्भ में खाड़ी की ‘मौजूदा शांति’ वास्तव में भ्रामक है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ता नियंत्रण और जहाजों की जब्ती जैसी घटनाएं संकेत देती हैं कि तनाव सतह के नीचे लगातार उबल रहा है। यदि यह जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ना तय है। 55 करोड़ बैरल तेल का नुकसान और एलएनजी आपूर्ति में दो प्रतिशत की गिरावट केवल आंकड़े नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी हैं।
अमेरिका इस दौरान ईरान पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाए रखना चाहता है, जबकि ईरान ‘थोपी गई शर्तों’ को अस्वीकार कर अपनी संप्रभुता का प्रदर्शन कर रहा है। यह गतिरोध तभी टूटेगा, जब दोनों पक्ष कुछ लचीलापन दिखाएं। यदि अमेरिका ईरान के प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार करता है, तो समाधान की दिशा खुल सकती है, परंतु अनिश्चित युद्ध विराम का एक बड़ा खतरा यह है कि यह स्थायी अस्थिरता को जन्म देता है।
यह न तो पूर्ण युद्ध है, न ही वास्तविक शांति, बल्कि एक ऐसी स्थिति है, जहां किसी भी क्षण संघर्ष फिर भड़क सकता है। यही कारण है कि वर्तमान ठहराव भविष्य के अधिक बड़े टकराव का संकेत भी हो सकता है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता और खाड़ी में बड़ी भारतीय आबादी के कारण भारत को संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनानी होगी।
भारत को एक ओर अपनी ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक स्तर पर दोनों पक्षों से संवाद भी बनाए रखना होगा। ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की मौजूदा नीति यहां सबसे उपयुक्त प्रतीत होती है। कुल मिलकर यह अनिश्चित युद्ध विराम शांति का संकेत कम और रणनीतिक विराम अधिक है। यदि इसे ठोस कूटनीतिक पहल में नहीं बदला गया, तो यह भ्रामक शांति जल्द ही नए संघर्ष का भीषण मोर्चा खोल सकती है।
