हुस्न का सप्लायर: सपनों की दिल्ली ने तोड़ा, गांव ने दिया सहारा
डेस्क स्टोरीः अट्ठारह बरस की माया का यौवन निखर रहा था। घर में इन दिनों एक ही चर्चा थी-माया का विवाह। पिता, चाचा, ताऊ जब भी इकट्ठे बैठते, बात घूम फिरकर उसी पर आ जाती। सबकी निगाह में एक ही लड़का था-नरेश। वह बीए पास, बीस बीघे खेत, पक्का मकान, सादा स्वभाव। माया जब उसके बारे में सोचती, तो उसे लगता था जैसे कोई शांत नदी है, जिसमें लहरें नहीं उठतीं।
कोरोना की दूसरी लहर आई तो नरेश उसकी चपेट में आ गया। उसकी मां तीर्थयात्रा पर गई हुई थी। पिता बचपन में ही गुजर चुके थे। उसने मामा और चाचा को फोन किया। उन्होंने हिदायतें दी- “काढ़ा लेना, स्टीम लेना और दर्द की दवाई लेना”, फिर फोन रख दिया। उसने दोस्तों को दवा दे जाने के लिए फोन किया, किसी ने बहाना कर दिया, किसी ने साफ मना कर दिया। उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उस दिन शाम को दरवाजे की घंटी बजी। नरेश ने सोचा-शायद चाचा या मामा आ गए। वह दरवाजे पर पहुंचा। दरवाजा खोला तो सामने माया खड़ी थी अपने पिता के साथ। उसके हाथ में एक थैला था, जिसमें खाना और दवाईयां थीं और चेहरे पर चिंता थी।
“अंदर चलो,” उसने बस इतना कहा। उस दिन से कई दिन तक वह आती रही। खाना लाती, दवाई देती, ऑक्सीजन का इंतजाम करती थी। गांव के लोग तरह-तरह की बातें बनाते थे, लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करती थी। कुछ दिन बाद नरेश की मां तीर्थकर वापस लौट आई। जब उसने पूरा वृतांत सुना तो बोली- “बेटा, मुझे उस लड़की से मिलवा दे, मैं उसे अपनी बहू बनाना चाहती हूं।” उस दिन के बाद जब भी नरेश माया के घर जाता था, उसकी आंखों में एक संकोची-सा प्रेम तैरने लगता। एक दिन उसने कह ही दिया- “माया, तुम मुझे अच्छी लगती हो। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?
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माया ने उसकी ओर देखा फिर धीरे से नजरें हटा ली। उसे लगता था-नरेश से शादी का मतलब है, इसी गांव में रह जाना, खेत खलिहान, वही लोग, वही जिंदगी। इसी बीच उसकी नौकरी दिल्ली में लग गई। दादी ने समझाया- “मुर्गी का चूजा अंडे के खोल से निकलता है, मां से हटते ही बाज झपट ले जाता है। लड़की जात को बहुत संभलकर रहना पड़ता है।”
माया हंस दी। उसे यह बातें पुराने जमाने की डरपोक सोच लगी। दिल्ली ने उसे चकित कर दिया- हाई बिल्डिंग, चौड़ी सड़के और शॉपिंग मॉल। उसे लगा, जैसे वह सचमुच किसी और दुनिया में है। कैलाशपुरी के एक छोटे से किराए के कमरे में रहते हुए भी उसे लगता- वह अब गांव वाली माया नहीं रही। ऑफिस में वह टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलती, पर बोलती जरूर थी। उसे लगता कि अंग्रेजी बोलने लगते ही जिंदगी बदल जाती है। हर अंग्रेजी शब्द उसे गांव से दूर और शहर के करीब ले जा रहा है, लेकिन शहर ने जल्दी ही उसे उसका सच दिखा दिया-भीड़ में आदमी सबसे ज्यादा अकेला होता है।
अकेलेपन से बचने के लिए उसने एक डेटिंग एप डाउनलोड कर लिया। वही उसकी मुलाकात वैभव से हुई। वैभव की बातें अलग थी। वह शायरी करता था, दर्द की बातें करता था और ऐसे बोलता था जैसे दुनिया ने उसके साथ बहुत बुरा किया हो। एक दिन उसका मैसेज आया- “मैं डेटिंग प्लेटफार्म के रेस्तरां की सबसे पिछली टेबल पर तुम्हारा इंतजार करूंगा।” माया गई। वैभव ने कहा- “तुम्हें देखकर ऐसा लगा जैसे कोई ख्वाब सामने आ गया हो। तुम्हारे लिए क्या मंगवाऊं-सॉफ्ट ड्रिंक या मॉकटेल?” “जी, सॉफ्ट ड्रिंक।” माया ने असहज महसूस होते हुए कहा- “लाइट्स यहां पर काफी मद्धिम है?”
“जी, ठीक कह रही हैं आप- शायद रैस्तरां वाले यही चाहते हैं कि यहां पर मिलने वाले एक दूसरे को चकाचौंध कर देने वाले कृत्रिम उजाले में न पहचाने। परख करें तो टटोल-टटोलकर, ठीक वैसे ही जैसे हम मद्धिम अंधेरे में एक खो गई जरूरी चीज को कई-कई बार ढूंढते हैं।” “लेकिन हम अंधेरे की परतें उधेड़ने नहीं, सुकून की एक शाम गुजारने को मिल रहे हैं।” माया ने मुस्कुराते हुए कहा। वैभव ने शायराना अंदाज में कहा- “यहां हर चीज बिकती है, काश! सुकूं-ए-दिल भी कहीं मिल जाता।” बातों-बातों में माया ने धीरे से कहा- “आपके प्रोफाइल में लिखा हुआ था- “सप्लायर”। आप क्या सप्लाई करते हैं?” “जी, मैंने जिंदगी की शुरुआत एक सप्लायर की तरह की थी। आज भी मैं वही चीज सप्लाई करता हूं, जो सबकी जरूरत है।” “अच्छा मज़ाक कर लेते हैं, आप।”
“न मैं अपने बारे में डींगे भरता हूं, न झूठ बोलता हूं।” वैभव ने उसे अपने टूटे हुए जीवन की कहानी इस तरह सुनाई- “घर टूट गया, छूट गया, अब बस काम है और अकेलापन।” माया को उसकी बातें गहरी लगीं। उसे लगा वह बहुत समझदार और संवेदनशील आदमी है। वह उसके दुख का हिस्सा बन गई। उसका दर्द बांटते-बांटते उसकी ओर खिंचती चली जा रही थी। न जाने उसके मन में क्या चल रहा था, वह अक्सर रविवार को उसके लिए कुछ न कुछ बनाकर ले जाती थी, छोटे से टिफिन में कभी मीठी तो कभी नमकीन। बाद में यह नजदीकी इतनी बढ़ी कि साथ में वे फिल्म देखने चले जाते। वह एक बहाना होता, वह उसे दया नम्रता सहानुभूति के कोमल तंतुओं से सहलाना चाहती थी। छह महीने में वह अपने बारे में सोचना भूल चुकी थी जब देखो... “वैभव... वैभव...।” एक रविवार को वैभव नहीं आया। उसका फोन भी बंद था। बेचैनी में माया पहली बार उसके घर पहुंच गई। दरवाजा एक औरत ने खोला। उसकी आंखों में एक अजीब सी थकान थी। “आप वैभव से मिलने आई हैं?” उसने पूछा। माया ने सिर हिला दिया। औरत कुछ छड़ चुप रही, फिर बोली- “बहन एक बार मैं भी उसके प्रेम जाल में फंसकर यहां आई थी, पर यहां से निकल नहीं सकी।”
माया चौकी- “क्या मतलब...” औरत ने बहुत शांत आवाज़ में कहा- “वह हुस्न का सप्लायर है। वह खूबसूरत लड़कियों को पटाता है, बेच देता है।” माया के अंदर जैसे सब कुछ टूट गया। “अगर बच सकती हो, तो भाग जाओ” औरत ने कहा। लेकिन अब देर हो चुकी थी। वैभव सब कुछ देख- सुन चुका था। उसे डर था-माया उसकी सच्चाई खोल देगी।
वह अचानक सामने आ गया और बिना एक शब्द कहे, उसे दूसरी मंजिल से धक्का दे दिया। जब उसे होश आया, वह अस्पताल में थी। उसकी एक टांग काटनी पड़ी थी। मां रो रही थी, पिता चुप थे। माया छत की ओर देखती रहती और सोचती रहती, जिस आजादी के लिए वह गांव छोड़कर आई थी, वह आजादी उसे कहां ले आई?
कई महीने बाद वह कृत्रिम पैर के सहारे गांव लौटी। अब वही घर, वही आंगन, वही लोग थे, पर माया बदल चुकी थी। मां की आंखों में एक ही चिंता थी-“कौन करेगा इससे शादी?” इस समय दरवाजे पर नरेश खड़ा था। उसके साथ उसकी मां भी थी। नरेश ने मां से कहा- “यह वही लड़की है, जिसे तुम अपनी बहू बनाना चाहती थीं।” माया ने नरेश की मां के पैर छुए फिर कहा- “मां मैं अपाहिज हूं।” मां ने उसे गले लगाकर कहा- “तुम मेरे बेटे को काल के गाल से खींच कर बाहर ले आई। उसका जीवन तुम्हारा ही दिया हुआ है।”
माया फूट-फूट कर रो पड़ी। इतने महीनों बाद वह पहली बार रोई थी। उसे लगा, जैसे उसके भीतर जमा सारा अहंकार, सारा भ्रम आंसुओं के साथ बह रहा हैं। कुछ दिनों बाद मंदिर में उनकी शादी हो गई। उस रात, जब सब सो गए, माया आंगन में थी। आकाश शांत था। उसे अचानक लगा-शहर ने उसे बहुत कुछ दिखाया, पर कुछ भी नहीं दिया। गांव... जिसे उसने कभी नहीं सराहा, उसने सहारा दिया। अब उसे समझ में आया-जिंदगी आजादी में नहीं, पहचान में बसती है। सच्चा प्यार वह होता है, जो टूटने के बाद भी जुड़ जाता है।
