स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी दावे और हाईकोर्ट की नाराजगी

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Published By Deepak Mishra
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हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर हाल ही में तल्ख टिप्पणी की है। वह सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

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विवेक सक्सेना, अयोध्या

 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को ‘राम भरोसे’ बताया जाना महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि राज्य के स्वास्थ्य ढांचे की जर्जर स्थिति का एक आईना है। मेरठ मेडिकल कॉलेज में एक मरीज के शव के साथ लापरवाही के मामले में न्यायालय की यह तल्ख टिप्पणी (2021) और हाल ही में वेंटिलेटर की उपलब्धता पर सवाल (2026) उठाती है। यह दर्शाते हैं कि समय बदलने के बावजूद जमीनी हकीकत में खास सुधार नहीं हुआ है। यह टिप्पणी राज्य सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि स्वास्थ्य सेवा, जो नागरिकों का मौलिक अधिकार है, वह नौकरशाही की ढिलाई और संसाधनों के अभाव में दम तोड़ रही है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर हाल ही में जो तल्ख टिप्पणी की है, वह न केवल समयोचित है, बल्कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से उजागर करती है। अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि मरीजों को समय पर महत्वपूर्ण देखभाल उपकरण उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो सांख्यिकीय दावों का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति राजन रॉय और मनजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सवाल उठाया कि क्या कोई अस्पताल हलफनामे में यह कह सकता है कि आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर तुरंत उपलब्ध कराया जाएगा। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि ऐसा आश्वासन नहीं दिया जा सकता है, तो वेंटिलेटर की उपलब्धता पर प्रस्तुत आंकड़े अर्थहीन हो जाते हैं। खंडपीठ का यह सवाल कि ‘अगर जरूरत पड़ने पर मरीजों को वेंटिलेटर नहीं मिल सकता, तो आंकड़ों का क्या फायदा?’ सीधे तौर पर स्वास्थ्य प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठाता है।

अदालत ने साफ किया है कि वेंटिलेटर की संख्या के कागज पर मौजूद आंकड़े तब तक अर्थहीन हैं, जब तक कि वे जीवन के नाजुक क्षण में मरीज तक तुरंत न पहुंच सकें। जब वेंटिलेटर की कमी के कारण मौतें होती हैं, तो प्रशासनिक हलफनामे केवल खानापूरी बनकर रह जाते हैं। न्यायालय का यह कहना कि ‘वास्तविक मांग का आकलन करने और जीवन रक्षक उपचार के लिए आवश्यक वेंटिलेटरों की संख्या निर्धारित करने के लिए एक तंत्र का स्पष्ट अभाव है’, भी स्वास्थ्य प्रणाली की अक्षमता को दर्शाता है।

अदालत ने राज्य सरकार से स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट और चिकित्सा बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाकर एक बड़ा मुद्दा उठाया है। यह केवल वेंटिलेटर खरीदने भर का मामला नहीं है, बल्कि उन्हें संचालित करने के लिए आवश्यक जनशक्ति (डॉक्टर, तकनीशियन) और बुनियादी ढांचा (ऑक्सीजन, बिजली) सुनिश्चित करने का भी है। अक्सर देखा जाता है कि वेंटिलेटर तो उपलब्ध होते हैं, लेकिन या तो वे खराब होते हैं या उन्हें चलाने के लिए विशेषज्ञ नहीं होते। पीठ का इस बात पर जोर देना कि वेंटिलेटर की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, ताकि उनकी कमी के कारण किसी की जान न जाए, यह दर्शाता कि देश-प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।

कोर्ट ने अपने समक्ष रखे गए आंकड़ों पर भी असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि वास्तविक मांग का आकलन करने और जीवन रक्षक उपचार के लिए आवश्यक वेंटिलेटरों की संख्या निर्धारित करने के लिए एक तंत्र का स्पष्ट अभाव है। अदालत ने राज्य सरकार से स्वास्थ्य सेवा के लिए आवंटित राज्य बजट के अनुपात को स्पष्ट करने और चिकित्सा अवसंरचना की स्थिति के संबंध में विवरण तो मांगा ही है। साथ ही राज्य को अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानदंडों को पूरा करने से संतुष्ट न रहने का निर्देश भी दिया है, जैसे कि अस्पताल के बिस्तरों के 10-15 प्रतिशत के बराबर वेंटिलेटर बनाए रखना।

यही नहीं न्यायालय ने निजी अस्पतालों की फीस और उनकी सेवाओं की निगरानी के लिए विनियामक ढांचे के अभाव पर भी चिंता जताई है। स्पष्ट कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी अस्पताल मरीजों के जीवन को दांव पर न लगाए। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वेंटिलेटर की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि इनकी कमी के कारण किसी की जान न जाए। अदालत ने अपने सामने पेश किए गए आंकड़ों पर असंतोष व्यक्त किया। राज्य सरकार से पूछा कि स्वास्थ्य सेवा के लिए राज्य के बजट का कितना हिस्सा आवंटित किया गया है और चिकित्सा ढांचे की मौजूदा स्थिति के बारे में पूरी जानकारी देने को कहा। 

अदालत ने राज्य सरकार को अपने नजरिए पर फिर से विचार करने की नसीहत देते हुए यह भी कहा कि सरकार को सिर्फ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों को पूरा करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान, पीठ ने राज्य सरकार से यह भी जानकारी मांगी कि क्या निजी अस्पतालों और क्लिनिकों को नियंत्रित करने के लिए कोई नियामक ढांचा मौजूद है? विशेष रूप से उपचार और सेवाओं की निगरानी के लिए ली जाने वाली फीस के संबंध में। सरकारी डॉक्टरों के कम वेतन पर भी चिंता जताई गई, कहा कि इससे डॉक्टर निजी अस्पतालों की ओर पलायन करते हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ता है। 

कोर्ट ने राष्ट्रीय नगर निगम (एनएमसी) और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मामले में पक्षकार बनाया है। मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी एक चेतावनी है कि स्वास्थ्य सेवा एक संवैधानिक अधिकार है। 

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