जापान की बदली रक्षा नीति से चीन घबराया

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Published By Deepak Mishra
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने शांतिवादी नीति अपना ली थी। अब उसने चीन और उत्तर कोरिया की बढ़ती आक्रमकता को देखते हुए अपनी नीति में बदलाव कर दिया है।

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नवीन गुप्ता, बरेली

 

चीन और जापान की दुश्मनी जग जाहिर है। चीन इस बात से परेशान है कि जापान परमाणु बम परीक्षण कर सकता है। चीन को डर है कि कहीं जापान भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन गया, तो उसके लिए मुश्किल खड़ी होगी। यही वजह है कि उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में जापान को परमाणु बम के परीक्षण से रोकने की गुहार लगाई है। जापान ने भी अब चीन से आंखों से आंखें मिलाकर बात करने की ठान ली है।

चीन की बढ़ती दादागिरी को रोकने के लिए ही उसने अपने पड़ोसी और चीन के दुश्मन राष्ट्रों के साथ सामरिक दृष्टि से अपने रिश्ते मजबूत करने शुरू कर दिए हैं। जापान ने न सिर्फ फिलीपींस के साथ मिल कर दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता को रोकने के लिए कदम उठाया, बल्कि आस्ट्रेलिया, वियतमान से भी उसने कई समझौते किए हैं, जो चीन की टेंशन बढ़ाने वाले हैं। 

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और उसके मित्र राष्ट्रों को हार का सामना करना पड़ा था। इस युद्ध में मिली हार के बाद से ही जापान और चीन में तनाव बना हुआ है। बीच-बीच में रिश्ते सुधर जाते हैं, लेकिन कई ऐसे मौके आते हैं, जब चीन दादागिरी दिखाने की कोशिश करता है, तो जापान को भी आंखें तरेरनी पड़ती हैं। फिलहाल पिछले कई महीने से चीन और जापान के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण है ताइवान।

जापान की प्रधानमंत्री सनाई तकाइची द्वारा ताइवान की चीन से रक्षा के एलान से ही चीन नाराज है। कई बार उसने जापान की समुद्री सीमा और हवाई सीमा का उल्लंघन किया है। चीन सीधे जापान को युद्ध की धमकी देता है। इससे जापान नाराज है और चीन के बढ़ते खतरे को देखते हुए ही अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने का एलान कर चुका है। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने शांतिवादी नीति अपना ली थी और उसने घातक हथयारों के उत्पादन और निर्यात पर खुद ही प्रतिबंध लगा दिया था। तय किया गया था कि उसकी सेना सिर्फ आत्मरक्षा तक सीमित रहेगी, लेकिन अब उसने चीन और उत्तर कोरिया की बढ़ती आक्रमकता को देखते हुए अपनी नीति में बदलाव कर दिया है और लड़ाकू विमान, मिसाइल आदि के निर्यात को मंजूरी दे दी है। यहां तक कि परमाणु बम बनाने की दिशा में भी उसने कदम उठाए हैं। 

इसके संकेत मिलते ही चीन परेशान हो उठा है, इसीलिए चीन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र को इसकी जानकारी दी है और यह कहा है कि यदि जापान को रोका नहीं गया, तो वह आने वाले दिनों में परमाणु हथियार का परीक्षण कर सकता है। चीन का तो यहां तक दावा है कि जापान के पास प्लूटोनियम की इतनी मात्रा है कि वह 55 सौ परमाणु हथियार बना सकता है। 

चीन ने संयुक्त राष्ट्र को दी गई शिकायत में कहा है कि जापान कम समय में न्यूक्लियर ब्रेक आउट हासिल करने की क्षमता रखा है। चीन से इसे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। कहा है कि जापान अपने शांतिवादी संविधान, परमाणु हथियार न रखने और न ही बनाने और न लाने की नीति में बदलाव की कोशिश कर रहा है। यहां समझना जरूरी है कि चीन की परेशानी का सबसे बड़ा कारण है जापान द्वारा अपनी नीति में किया गया बदलाव। 

जापानी प्रधानमंत्री ने एक 15 सदस्यीय पैनल बनाया है, जिसने तीन गैर परमाणु सिद्धांतों को बदलने की स्पष्ट वकालत की है। साथ ही जापान को लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइलों के निर्माण पर जोर दिया है। इतना ही नहीं चीन को डर है कि कहीं जापान अमेरिका को अपनी धरती पर परमाणु हथियार रखने वाली मिसाइलों की तैनाती की अनुमति दे सकता है। चीन के साथ ही उत्तर कोरिया भी लगातार जापान को धमकियां देता है। इससे जापान ने चीन से परेशान उसके पड़ोसियों के साथ गठबंधन बनाने की ठान ली है, इसीलिए आस्ट्रेलिया, वियतनाम, फिलीपींस जैसे देशों के साथ जापान ने इसकी चर्चा भी शुरू कर दी है। 

आस्ट्रेलिया और जापान के बीच तो पिछले महीने सात अरब डालर से अधिक का ऐतिहासिक युद्धपोत समझौता हुआ है। अब जापान की ओर से आस्ट्रेलिया को 11 उन्नत मोगामी श्रेणी के फ्रिगेड दिए जाएंगे। जापानी कंपनी मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्री इस फ्रिगेट को तैयार करेगी। इस समझौते से भी चीन परेशान है। चीन, जापान से इस बात से नाराज है कि वह ताइवान का समर्थन क्यों कर रहा है, जबकि जापान अब ताइवान के प्रति चीन की आक्रमता को रोकने के लिए हर कदम उठाने को तैयार है। इसमें उसे अमेरिका का भी पूरा साथ मिल रहा है। 

अमेरिकी रक्षा कंपनियां ताइवान को बड़े पैमाने पर हथियारों की आपूर्ति करती हैं। जरूरत पड़ने पर जापान भी अमेरिका जैसा ही कदम उठा सकता है। यदि ऐसा होता है तो चीन के लिए मुश्किल बढ़ेगी ही कम नहीं होगी। हाल में ही जापान और इंडोनेशिया के बीच ऊर्जा के साथ ही रक्षा समझौता भी हुआ है। इंडोनेशिया और चीन के बीच भी तनाव है। ऐसे में विरोधी देशों के एक मंच पर आने से चीन चिंतित है। उसे लगता है कि उसकी बढ़ती दादागिरी को रोकने के लिए यदि ये सभी देश एकजुट होंगे, तो उसकी शक्तियां कमजोर होंगीं। 

जापान, ताइवान को अपनी फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस मानता है। यही वजह है कि वह ताइवान के पास स्थित योनागुनी द्वीप पर अब मिसाइल बेस बना रहा है। चीन चाहता है कि जापान किसी भी स्थिति में ताइवान का साथ न दे, लेकिन खुद की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जापान पूरी शिद्दत के साथ ताइवान के साथ खड़ा है।