बोध कथा:पत्थर और बांसुरी
एक बहुत ही कुशल मूर्तिकार था, जो पहाड़ों से पत्थर चुनकर सुंदर मूर्तियां बनाया करता था। एक दिन वह जंगल में गया और उसे दो बड़े पत्थर मिले। उसने सोचा, इनसे मैं दो महान कलाकृतियां बनाऊंगा। उसने पहले पत्थर पर अपनी छेनी से वार करना शुरू किया। जैसे ही पहली चोट पड़ी, पत्थर के भीतर से एक दर्द भरी कराह निकली- “रुको! मुझे बहुत दर्द हो रहा है।
कृपया मुझ पर वार मत करो, मुझे वैसे ही रहने दो जैसा मैं हूं।” मूर्तिकार दयालु था, उसने उस पत्थर को छोड़ दिया। वह दूसरे पत्थर के पास गया। जब उसने उस पर काम शुरू किया, तो वह पत्थर भी कांप रहा था, लेकिन उसने एक शब्द नहीं कहा। मूर्तिकार ने उसे तराशना जारी रखा। हफ्तों की कड़ी मेहनत, चोट और घर्षण के बाद, उस साधारण पत्थर ने एक अत्यंत सुंदर बांसुरी बजाते हुए बालक की मूर्ति का रूप ले लिया।
कुछ समय बाद, उस जंगल के पास एक भव्य मंदिर बना। मूर्तिकार ने वह ‘बांसुरी बजाते बालक’ की मूर्ति मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दी। लोग दूर-दूर से उस मूर्ति की सुंदरता देखने और दर्शन करने आने लगे। तभी मंदिर के कर्मचारियों को अहसास हुआ कि मंदिर के द्वार पर एक ऐसे पत्थर की जरूरत है, जिस पर लोग अपने जूते-चप्पल उतार सकें। मूर्तिकार को याद आया कि जंगल में एक पत्थर उसने बीच में ही छोड़ दिया था। वह उसे उठा लाया और मंदिर की सीढ़ियों के पास रख दिया।
एक रात, जब मंदिर के पट बंद हो गए, तो नीचे रखे उस पत्थर ने ऊपर विराजमान मूर्ति से पूछा- “यह कैसा अन्याय है? हम दोनों एक ही पहाड़ के टुकड़े थे, एक ही दिन यहां लाए गए, लेकिन आज लोग तुम्हारी पूजा कर रहे हैं, तुम्हें फूलों का हार पहना रहे हैं, और मुझ पर धूल-मिट्टी झाड़कर निकल जाते हैं। ऐसा क्यों?”
मूर्ति ने बड़ी शालीनता से उत्तर दिया- “मित्र, याद करो वह दिन जब कलाकार ने पहली चोट तुम पर की थी। तुमने दर्द से बचने के लिए संघर्ष को ठुकरा दिया और उसी अवस्था में रहना चुना, जिसमें तुम थे। मैंने उस हर चोट को सहा, हर घाव को अपनी प्रगति माना और खुद को तराशने दिया। आज मैं इसलिए पूजा जा रहा हूं, क्योंकि मैंने ‘चोट’ सहने का साहस दिखाया और तुम इसलिए पैर रखने के काम आ रहे हो, क्योंकि तुमने आराम को विकास से ऊपर रखा।”
कथा से सीख मिलती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां और संघर्ष वास्तव में ईश्वर की ‘छेनी और हथौड़ी’ हैं, जो हमें एक बेहतर इंसान के रूप में तराश रही होती हैं। यदि हम आज के संघर्ष से भागेंगे, तो हम कल की ऊंचाई कभी नहीं छू पाएंगे।
-प्रमोद श्रीवास्तव
