राजस्थान में गेहूं की खेती क्यों बनता जा रहा महंगा सौदा
राजस्थान में गेहूं पैदा करना अब किसानों के लिए लगातार महंगा सौदा बन गया है। हालात ऐसे हैं कि एक तरफ खेती की लागत तेजी से बढ़ रही है और दूसरी तरफ किसानों की बचत उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रही। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के विपणन अनुमान 2025 के आंकड़ों से इस समस्या की गंभीरता साफ दिखाई देती है। बड़ा सवाल है कि निरंतर बढ़ती लागत को किसान कैसे और कब तक झेल पाएंगे?
आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान में एक क्विंटल गेहूं पैदा करने की लागत करीब 1488 रुपये तक पहुंच चुकी है। वहीं पंजाब में यही लागत लगभग 905 रुपये है। यानी राजस्थान का किसान पंजाब के किसान की तुलना में करीब 64 प्रतिशत ज्यादा खर्च करके गेहूं उगा रहा है। यह सिर्फ आंकड़ों का अंतर नहीं है, बल्कि उन मुश्किल परिस्थितियों की हकीकत है, जिसे झेल कर राजस्थान का किसान खेती कर रहा है।
देश में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी सभी राज्यों के लिए एक समान तय किया जाता है। इस साल गेहूं का एमएसपी 2585 रुपये प्रति क्विंटल रखा गया है। सुनने में यह व्यवस्था बराबरी वाली लगती है, लेकिन समस्या इसलिए पैदा होती है, क्योंकि खेती की लागत हर राज्य में अलग-अलग है। पंजाब और हरियाणा में बेहतर सिंचाई व्यवस्था, मजबूत कृषि ढांचा और ज्यादा उत्पादन होने के कारण किसानों की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है। वहीं राजस्थान का किसान कम पानी, महंगी सिंचाई और बढ़ती मजदूरी के बीच खेती करने को मजबूर है। ऐसे में समान एमएसपी होने के बावजूद उसकी वास्तविक बचत काफी कम रह जाती है।
राजस्थान में पानी की कमी खेती की सबसे बड़ी चुनौती है। प्रदेश के कई इलाकों में किसान पूरी तरह ट्यूबवेल और भूमिगत जल पर निर्भर हैं। भूजल लगातार नीचे जा रहा है और सिंचाई के लिए बिजली तथा डीजल पर खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। गेहूं को समय पर और कई बार सिंचाई चाहिए, बिजली और डीजल के खर्च के कारण यह सिंचाई स्वाभाविक रूप से यहां ज्यादा महंगी पड़ती है। इसके मुकाबले पंजाब में वर्षों से नहरों और भूजल आधारित सिंचाई का मजबूत नेटवर्क किसानों को राहत देता रहा है। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों के ज्यादातर इलाकों में नहरों का जाल बिछा हुआ है, लेकिन यहां भी फसलों की जरूरत के समय नहर बंदी समस्या पैदा करती है।
खेती की लागत बढ़ने में मजदूरी भी बड़ा कारण बन रही है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में कृषि मजदूरी तेजी से बढ़ी है। गांवों से मजदूरों का शहरों की ओर पलायन बढ़ने के कारण खेती के समय मजदूर आसानी से उपलब्ध नहीं होते। मजबूरन, किसानों को ज्यादा दिहाड़ी देकर मजदूर बुलाने पड़ते हैं। छोटे किसानों के लिए यह खर्च और ज्यादा भारी साबित होता है। मशीनों का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। ट्रैक्टर, कंबाइन और अन्य कृषि उपकरणों का किराया पहले की तुलना में काफी महंगा हो चुका है। डीजल के बढ़ते दामों ने इस बोझ को और बढ़ा दिया है। जिन किसानों के पास कम जमीन है, उनके लिए मशीनों की लागत उत्पादन के अनुपात में और ज्यादा पड़ती है।
यही वजह है कि सिर्फ गेहूं ही नहीं, बल्कि सरसों, चना और जौ जैसी फसलों की लागत भी लगातार ऊपर जा रही है। यहां यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए गेहूं पर 150 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देना शुरू किया है। यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय है, क्योंकि इससे किसानों को कुछ आर्थिक सहारा मिलता है, लेकिन जिस तेजी से खेती की लागत बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह राहत कम ही है। कई किसानों का मानना है कि सरकार को बोनस राशि बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि उन्हें वास्तविक राहत मिल सके। केवल बोनस से समस्या का पूरा समाधान संभव नहीं है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
