जानें बुआ की कहानी... एक ढाल, एक सुकून

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊ, अमृत विचारः मां की याद उभरती-ख्वाबों की तरह। मैंने उसे कभी देखा नहीं, फिर भी उसकी याद को दिल में संजोए रहा हूं। बुआ के पास उसकी एक तस्वीर देखी है, जिसे देखने पर दिल में ख्वाब जाग उठते थे और मैं दुलार की कामना में खोने लगता था। मौसी जब बखेड़ा कर बैठती तब लगता कि मां होती तो यह होता ही क्यों, मौसी घर में आती ही क्यों? बापू दूसरी शादी करते ही क्यों। होनी को कौन टाल सकता है। मां मेरी तो मौसी गई। अपना भाग्य, दोष किसे दूं? मुझे तो अपना जीवन जीना ही था। मां के अभाव को बुआ ने महसूस नहीं होने दिया। फिर भी यह लगता ही था कि कहीं कुछ अधूरा है, वीरान है। कोई तड़प जगती और हम बुआ की गोद में मुंह घुसेड़कर रो दिया करते। मेरी मां बुआ को बहुत चाहती थी। उसकी मौत के समय मेरी उम्र एक माह की थी। भाभी के बच्चों को पालना ही बुआ ने अपना फर्ज समझा और ससुराल से अपना नाता सदा-सदा के लिए तोड़ लिया।

बड़ी दो बहनों की शादी मां के सामने हो गई थी। कौशल्या बची थी और एक मैं-जिसका बोझ बुआ के बेसहारा कंधों पर था। मौसी जब हमें लेकर कोहराम छेड़ती, तब बुआ अपनी गोद में हमें दुबका लेती और मौसी को भला-बुरा समझाती, परंतु वह थी कि समझती ही नहीं थी। बापू भी मौसी की ही तरफदारी करते थे। बुआ हमारे लिए उनसे कुछ लाने को कह देती तब मौसी बिफर उठती और हमें सौत का गोबर कहकर कोसा जाता था। बापू चुपचाप सब सुनते थे, लेकिन कहने को उनके पास कुछ नहीं होता था और ही मौसी को उन्होने कभी कुछ कहा। मौसी के दोनों बच्चे खूब उत्पात मचाते और खुलकर हंसते-खेलते, लेकिन हमारे कूदने और हंसने पर पाबंदी थी। पड़ोस के मनहर काका के घर हमें खुलकर हंसने और खेलने की आजादी थी। वह काकी भी हमें बहुत चाहती थी। यह काकी मेरी मा की सखी थी। बापू पहले ऐसे नहीं थे। मा को बहुत चाहते थे और हमें भी बेहद प्यार करते थे, लेकिन यह सब मा के सामने ही था। अब जाने क्यों वे हम सभी से दूर रहने लगे थे।

बुआ शादी के बीस वर्ष बाद भी मां नहीं बन पाई थी। शायद कुदरत को यही मंजूर था। यह भी उन्होंने सोच लिया था कि बीस वर्षों में जब औलाद पैदा नहीं हुई तो-अब कहां से होगी। फूफा दूसरी ब्याहता ले आए थे और उससे उन्हें चार बच्चे प्राप्त हुए। उनका घर-संसार बस गया। बुआ को यही बड़ी खुशी थी। अब शायद हमें ही पाल-पोसकर वह मां की जगह बैठना मुनासिब समझने लगी थीं।

हमें रुआंसी आती तो वह छाती में हमें दुबका लेती और कहती-“मैं मां ही तो हूं! पगला-बौरा गया क्या?” बुआ और हम सौतेली मां के मोहताज थे। हालांकि बुआ स्वयं भी कमाती थी और जुगाड़ नहीं हुआ, तो बड़ी बहनों की ससुराल खबर कर देती, परंतु हमें किसी चीज से निसारा नहीं रखती थी। लाली हमें लुभा-लुभा कर बाजार जाती थी। मौसी की इस लड़की को जाने क्यों-हमें लुभाने में बड़ा मजा आता था। मौसी उसे प्यार करती दुलारती और हमें सुनाती हुई पैसे देकर बाजार भेजती। कहती-‘कुछ लेकर खा लेना।उस समय बुआ का मन-गमगीन होने लगता था। कुछ-कुछ बुनता-सा और सूरत रोनी-सी, कभी हमें लगता भी था कि वह रो रही है। कभी वह मौसी को समझाती- “परसी की बहू, बच्चों से यह भेद अच्छा नहीं। इन्हें भी कुछ ला दिया कर, खिला-पिला दिया कर! परसी का ही खून है, ऐसा दुराव ठीक नहीं।तब मौसी होंठ बिचकाती औरऊहूंकह कुढ़ पड़ती थी। हमें स्कूल पहुंचाकर बुआ निकट के ही गांव में, काम पर चली जाती थी। हमें कह कर जाती-“तुम्हारे लौटने तक जाऊंगी। स्कूल से सीधे घर आना, मौसी कुछ कहे तो जवाब नहीं देना। छींके पर रोटी रखी हैं-पूछकर खा लेना।

बुआ काम से लौटकर पूछती-“खाना खाया?” तो हम झूठे ही हामी भर देते। कौशल्या कहने लगती- “देर से क्यों आती हो बुआ?” तब वह कहती-“किसी दिन काम देर तक होता है तो देर हो ही जाती है।मौसी हंस पड़ती और आंखें नचाकर चिढ़ाती-“जनना तो रहा नहीं, पोसने चली है।...मालूम नहीं कहां-कहां मरती फिरती है।बुआ केवल घूरती-कुछ कहती नहीं। मां के मरने से ही बुआ को यह सब सुनना पड़ रहा था। काकी बतात़ी है-“ कभी तेरी मां ने बुआ को इतना नहीं कहा। इज्जत भी दी और सब्र भी।और मेरी मौसी, उसे तो बुआ फूटी आंख भी नहीं सुहाती।

एक रोज मौसी और बुआ में जोरदार झगड़ा हुआ। मौसी ने हमारे गूदड़ फेंक दिए और बुआ को घर की कच्ची कोठरी में रहने को ढकेल दिया। बापू ने सब देखा पर अनजान बने रहे। तब के बाद हम वहीं रहने लगे। बुआ सुबह काम पर जाती और देर संध्या तक घर लौटती। जीजी घर का काम संभालती। स्कूल जाने तक और स्कूल से लौटने तक-सब काम निपटा लेती।

कच्ची कोठरी में हम पहले से सुखी थे। वहां आनंद ही आनंद था। अपना मन और अपनी खुशी थी। गरीब हुए तो क्या हुआ-खुलकर हंस तो सकते थे। रोने पर भी कोई पाबंदी नहीं थी। अब बुआ को भी हम पहले सी चुप-चुप और गमगीन नहीं देखते थे, लेकिन बुआ काम से थकी-थकी घर लौटती और नींद में कुहुलती थी। समय बीतता गया और जीजी ने दसवीं पास कर ली। तब, एक रोज-बड़ी जीजी जीजाजी घर आए। उनके साथ दो औरतें भी थीं और एक पगड़बांध बुड्ढा भी। वह कौशल्या को देखने आए थे। बड़े जीजा के रिश्तेदार थे और उन्हीं के कहने से बुआ ने यह रिश्ता पक्का किया था। रिश्ता तय हुआ तो बुआ ने राहत की सांस ली। शादी की तारीख पक्की नहीं हुई थी, लेकिन बुआ बहुत प्रसन्न थी। मैं उस वक्त आठवीं में पढ़ रहा था। बुआ का स्वप्न जाग उठने को आतुर था। उसे राहत मिल रही थी कि अगले दो वर्ष में मुन्नू दसवीं पास कर लेगा। कहीं नौकर होगा तो राहत की सांस लूंगी। वह अब खामोश नहीं रहती थी, खूब चिहुंकती थी और खुश रहती थी। कहती थी- “साल-दो साल की मेहनत है, मुन्नू सब संभाल लेगा। सुख की नींद सोऊंगी और बहू से डटकर सेवा कराऊंगी। मेरा बेटा नौकर होगा तो घर भर को आराम देगा। बुढ़ापा गया है, अब आराम की सांस लूंगी। भाभी का कहा पूरा हुआ। मुझे सुख मिलेगा और उसकी आत्मा को शांति। परसी ने जो किया-वह भोगे। खैर! अब दिन ही कितने हैं?” जीजी आज दुल्हन बनी है। आंगन में मंगल-गीत गाए जा रहे हैं। औरतों ने जीजी को दुल्हन के रूप में इस कदर सजाया, मानो सुंदर चांद धरती पर उतर आया हो? ढोलक, थापी और नाच-आनंद! रस्म हुई और कौशल्या को डोली-सी सजी कार में लिए उसका दूल्हा अपने गांव उड़ गया। गांव भर ने जीजी को खूब कन्यादान दिया था। मौसी ब्याह में शामिल नहीं हुई और ही उसने बापू को हम तक आने दिया। बापू की जगह मनहर काका ने पूरी की। विदाई के समय जीजी काका के गले लगकर जी-भर रोई थी।

काका ने कहा था- “रो नहीं बेटी, जिनके पिता नहीं-वे अनब्याही

नहीं रहतीं और तेरे पास तो काका है, बुआ है, बड़ी बहनें और भाई है। तू काहे रोती है।पराया धन पराया हो गया। बुआ को जब कभी उसकी याद आती तो वह मुझे गोदी में दुबका लेती और बिस्तर में पड़ रहती। समय के साथ-साथ बुआ अब बुढ़ा गई थी। उसे चिंता थी- “जाने मेरे बाद मुन्नू का क्या होगा, कौन सम्भालेगा इसे? बुढ़ापा धमका, अब क्या भरोसा।मैंने इसी साल मैट्रिक पास किया था। बड़े जीजाजी ने नगर पालिका में जुगाड़ देखा और मुझे नौकरी पर खड़ा कर दिया। बुआ को मानो कारू का खजाना मिल गया था। वह बड़े जीजाजी की तारीफ करती नहीं अघाती थी। वर्षों से जो स्वप्न देख रही थी, वह पूरा होने को था। मन से बुआ हिम्मत किए थी, किंतु तन बुढ़ा गया था। वैसे उसके बोलने, हंसने और चलने में चमक दिखाई देने लगी थी। अब यही तमन्ना बाकी थी किमुन्नू का ब्याह रचा दूं और सुंदर-सी बहू मेरे आंगन में दिखाई दे।

बापू के प्रति कभी-कभार उसका विक्षोभ फूट पड़ता था और वह जाने उन्हें कितना कुछ कह जाती थी। मेरी मां को वह अब तक भुला नहीं पाई थी। मेरा वह इतना ख्याल रखती थी कि जरा-सा मुझे कुछ हुआ नहीं कि हिरनी-सी सहम जाती और अपने ही घर में बीमार-सी लगने लगती। मानो कोई खुशी उसके हाथों से निकली जा रही हो। मेरे बाहर जाने पर चिंतित हो उठती थी और मेरे लौटने तक फिक्र में ही कुढ़ती रहती। उस शाम, दरवाजा खुला था। भीतर गहरा सन्नाटा व्याप्त था। बाती तक नहीं जली थी। मुझे चिंता हुई- “क्या बुआ घर में नहीं है? बाती क्यों नहीं जलाई...कहीं बुआ बीमार तो नहीं?” मन घबराने लगा था। तेज तेज कदमों से मैं भीतर पहुंचा।


बुआ को आवाज दी। सन्नाटा और गहरा महसूस हुआ।  दीया जलाया तो देखा- लकड़ी के खंब से पीठ टिकाए बुआ मौन बैठी है। मन थर-थर कांपने लगा...कुछ शंका भी हुई। छूकर देखा-बुआ नहीं थी। बची थी सिर्फ माटी। सूखा तन-निढाल। आंखें दरवाजे पर लगी थीं, पूरी खुली हुई आंखें, मेरी ही बाट जोहती। हथेली से पलकों को मूंदा और बुआ की गोद में सिर रख फूट पड़ा। चीखने लगा मन। बुआ-बुआ पुकारता मैं तड़पने लगा था, लेकिन मेरी बुआ ने आंखें खोलकर एक बार भी मुझे नहीं देखा। बुआ कहूं या मां, जिसकी अर्थी को कंधों पर उठाए चल रहा हूं। पीछे रह गया बहनों का आंतर्नाद...मन के गह्नर में बुआ की जिंदा छवि उभर आई, जिसमें उसे कहते सुना- “मुन्नू सब संभाल लेगा...सुख की नींद सोऊंगी मैं...बहू से डटकर सेवा कराऊंगी।मन चीख पड़ा- “बुआ!” लेकिन बुआ तो नहीं बोली।

डॉ. सुरेश वशिष्ठ, साहित्यकार

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