Satire: छपासी पर चढ़ा व्यंग्य का भूत! पाठक अब ‘नजरअंदाज यंत्र’ पहनकर बच रहे हैं
एक समय था जब छपासी बाबू के कमजोर व्यंग्य-लेखन से केवल उनका परिवार ही संक्रमित था। घर वाले उनकी रचनाएं पढ़ते-सुनते इस कदर त्रस्त थे कि चाय की प्याली भी उन्हें व्यंग्यात्मक प्रतीत होने लगी थी। धीरे-धीरे यह संक्रमण फैमिली लाइफ, सोशल लाइफ (समाज) से सोशल मीडिया तक फैल गया। सोशल मीडिया पर मित्रों ने ओइजा बोर्ड की तरह पहले ‘वाह-वाह, बहुत खूब, शानदार’ की आड़ में व्यंग्य-आत्मा का आह्वान तो किया, लेकिन आलोचना के मंत्र से उस रूह को वापस भेजना भूल गए।
धीरे-धीरे छपासी बाबू पर व्यंग्य की रूहानी शक्ति ने कब्जा जमाना शुरू कर दिया। परिणामतः बेचारे पाठक, छपासी बाबू के भीतर समा चुकी व्यंग्य-आत्मा के व्यंग्यातंक के शिकार होने लगे।
संपादक महोदय की अनुकंपा हो या स्वयंभू व्यंग्यकार घोषित होने की तीव्र लालसा-छपासी बाबू को व्यंग्य लिखने की ऐसी खुजली हुई कि वह अब चर्मरोग का स्थायी रूप ले चुकी थी। प्रतिदिन सुबह, दोपहर, शाम और देर रात वे व्यंग्य के नाम पर ऐसी रचनाएं परोसते, मानो पाठकों के दिमाग का ‘भेजा फ्राई’ ही उनका साहित्यिक लक्ष्य हो। परिणामस्वरूप पाठक समुदाय मानसिक रूप से दुर्बल पड़ने लगा।
अंततः पीड़ित पाठकों ने सामूहिक बैठक बुलाई और व्यंग्य-मठ के फादर, अर्थात् आलोचक महोदय के चरणों में जाकर अपनी व्यथा सुनाई। आलोचक ने अपना ‘व्यंग्य-दर्शी उपकरण’ उठाया और छपासी बाबू के सोशल मीडिया खाते का निरीक्षण किया।
दो-चार पोस्ट पढ़ते ही वे समझ गए-मामला गंभीर है, यह साधारण लेखन नहीं, व्यंग्य-प्रेत-बाधा है।
स्थिति की गंभीरता देखते हुए फादर ने ‘राग दरबारी’ नामक पवित्र ग्रंथ उनके मस्तक पर रखकर उच्चारण किया-
“इन द नेम ऑफ सटायरिस्ट, इन द नेम ऑफ सटायर,
इन द नेम ऑफ होली स्पिरिट… बताओ, कौन हो तुम?”
छपासी धीरे से बोले-“मैं व्यंग्यकार हूं।” फिर फादर ने उनके कान में यूट्यूब पर उपलब्ध परसाई रचनावली का पाठ सुनाते हुए पूछा- “इन द नेम ऑफ सटायर, सच-सच बताओ, कौन हो तुम?”
छपासी गरजे-“मैं व्यंग्य लेखक हूं। अब क्या मुझे एसआईआर का प्रमाण देना पड़ेगा?”
फादर ने शांत स्वर में कहा-“पर तुम्हारी रचनाओं में व्यंग्य कहां है?”
छपासी मुस्कुराए-“मन की आंखों से पढ़िए, विशुद्ध, खांटी व्यंग्य दिखेगा।” आलोचक बोले-“सोशल मीडिया पर आपकी रचनाओं का थोक उत्पादन और प्रकाशन तो ठीक है, पर व्यंग्य का अंश हमें कभी दिखाई नहीं दिया।”
छपासी तर्क पर उतर आए-“अरे ओ व्यंग्यज्ञानी! हवा, भगवान और रूह भी तो दिखाई नहीं देते! तो क्या वे नहीं हैं? वैसे ही मेरी रचनाओं में व्यंग्य अदृश्य रूप से विद्यमान है।”
फादर ने अंतिम अस्त्र चलाया-“परसाई, जोशी, त्यागी-किस युग के व्यंग्यकार हो?”
छपासी गर्व से बोले-“हम तो हड़प्पा काल के व्यंग्यकार हैं।” “तो अब तक कुछ लिखा क्यों नहीं?”
छपासी भड़क उठे-“अरे, इतना लिखा कि ढेर लग गया। जब तुम लोगों ने हड़प्पा कालीन लिपि को अपठनीय मान लिया, तो मेरी रचनाओं में व्यंग्य कैसे समझोगे?”
फादर (आलोचक) समझ गए-भूत बड़ा चंट है, आसानी से उतरने वाला नहीं। उन्होंने ढेर सारे ताबीज अभिमंत्रित कर पाठकों में बांट दिए।
पाठकों ने पूछा-“यह क्या है?”
फादर(समीक्षक) गंभीरता से बोले-“यह ‘नजरअंदाज यंत्र’ है। इसे धारण कर लो। जब तक छपासी बाबू पर व्यंग्य-प्रेत सवार है, यही एकमात्र बचाव है।”
तब से पाठक निश्चिंत हैं। निराकार व्यंग्य-आत्मा को अपने नश्वर शरीर में स्थायी निवास प्रमाणपत्र जारी करने वाले छपासी बाबू आज भी प्रतिदिन सोशल मीडिया और संपादकों की कृपा से व्यंग्य-जगत में तांडव मचा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब पाठक ‘नजरअंदाज यंत्र’ पहनकर अपना साहित्यिक स्वास्थ्य सुरक्षित रखे हुए हैं।
विनोद कुमार विक्की
