तीस्ता जल समझौते और बांग्लादेश का रवैया
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद उम्मीद जगी थी कि भारत से उसके रिश्ते पटरी पर आएंगे। यह उम्मीद तब बलवती हुई थी, जब खुद बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इसके संकेत दिए थे और शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद मुख्य सलाहकार बने मोहम्मद यूनुस के भारत विरोधी फैसलों को पलट दिया था, लेकिन अब वहां ऐसी हरकतें हो रही हैं, जो यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि बांग्लादेश भारत विरोधी रवैया छोड़ने वाला नहीं है। उसका भारत विरोधी रवैया तीस्ता जल समझौते को लेकर दिखा।
तीस्ता जल समझौते को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थीं। अब उनका शासन खत्म हो गया है। बांग्लादेश के हुक्मरानों को इस बात की उम्मीद भी है कि भाजपा नीत नई सरकार इस समझौते को लागू कराने में मदद करेगी, लेकिन बिना देर किए इस पड़ोसी ने चीन से मदद मांग ली।
तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलती है और सिक्किम व पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश में प्रवेश कर ब्रह्मपुत्र नदी में विलीन हो जाती है। इसे बांग्लादेश की चौथी सबसे बड़ी नदी होने का दर्जा प्राप्त है। वहां के लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य स्रोत इसे माना जाता है। 1983 में भारत और बांग्लादेश के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत को 39 और बांग्लादेश को 36 फीसद जल मिलता था, जबकि बाकी 25 फीसद पानी का बंटवारा दोनों देश तय नहीं कर पाए थे।
2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहल पर बांग्लादेश के साथ नई संधि का मसौदा तैयार हुआ। इस प्रस्ताव में तय किया गया कि दिसंबर से मार्च के मध्य भारत को 42.5 फीसद और बांग्लादेश को 37.5 फीसद जल मिलेगा। बांग्लादेश इस समझौते को लागू करने पर सहमत भी हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने इसका पुरजोर विरोध किया। परिणामस्वरूप इसे लागू नहीं किया जा सका। अब ममता बनर्जी सरकार पश्चिम बंगाल से विदा हो चुकी है और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार बन गई है।
बांग्लादेश की ओर से भाजपा को वहां जीत पर बधाई देने के साथ यह उम्मीद जताई गई थी कि जल्द ही नई सरकार इस समझौते को लागू करने में मदद करेगी, लेकिन पड़ोसी ने बिना इंतजार किए चीन के पाले में कदम रखा और तीस्ता नदी पुनरुद्धार परियोजना के लिए औपचारिक रूप से चीन से समर्थन मांग लिया। इससे यह माना जा रहा है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान भी अपनी मां बेगम खालिदा जिया की राह पर चल रहे हैं। खालिदा जिया जब तक प्रधानमंत्री रहीं उन्होंने भारत विरोधी रुख अख्तियार किए रखा। चीन और पाकिस्तान से उनके अच्छे संबंध रहे।
भारत द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को शरण दिए जाने का मलाल अब भी बांग्लादेश के नेताओं को है। वे चाहते हैं कि हसीना को बांग्लादेश को सौंप दिया जाए, लेकिन इसके लिए भारत तैयार नहीं है। यही वजह है कि जब भी मौका मिल रहा है, बांग्लादेश के मंत्री या अधिकारी चीन और पाकिस्तान से अपने रिश्ते को मजबूती देने से नहीं चूक रहे हैं।
पिछले दिनों बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर्रहमान ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बैठक कर तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनरुद्धार परियोजना पर चर्चा की। इस बैठक के बाद चीन को भारत पर पलटवार करने का मौका मिला। वांग ने कहा कि सरकार चीन की कंपनियों को बांग्लादेश में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित करेगी। उनकी यह घोषणा भारत की चिंता बढ़ाने वाली है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
