Bareilly: बच्चों की मानसिक सेहत पर भारी पड़ रही पैरेंट्स की महत्वाकाक्षाएं
बरेली, अमृत विचार। दस साल का राम रेस में भाग लेता है। बहुत मेहनत करता है, पर तीसरे स्थान पर आता है। जैसे ही ब्रोंज मेडल दिखाता है, पिता कहते हैं कि तीसरा स्थान...? थोड़ी और मेहनत करते तो पहले आते। वहीं, मां कहती हैं कि अगली बार जीतोगे तो पार्टी करेंगे।
वीरांगना रानी अवंती बाई लोधी राजकीय महिला महाविद्यालय मनोवैज्ञानिक डॉ. सुरभि श्रीवास्तव कहती हैं कि माता-पिता की इन बातों से राम पर जीत के लिए दबाव डालने का काम किया। इससे उसके आत्मविश्वास को भी ठेस लगी। ऐसी बातें बच्चों के अंदर हीन भावना भी भर देती हैं। माता-पिता की अति ऊंची उम्मीदें बच्चों की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसे बच्चे हमेशा परफेक्शन तलाशते हैं, छोटी सी विफलता पर मानसिक रूप से टूट जाते हैं।
विशेषज्ञों की राय:
बिना शर्त स्वीकार्यता
मनोवैज्ञानिक डॉ. सुरभि श्रीवास्तव के अनुसार, बच्चे का मूल्य उसकी जीत या हार से तय नहीं होना चाहिए। उनके अस्तित्व को स्वीकार करें। जब बच्चे को यह भरोसा होता है कि गलती करने या हारने पर भी माता-पिता का प्यार कम नहीं होगा, तभी वह निडर होकर नई चुनौतियों का सामना कर पाता है। शर्त आधारित प्यार बच्चों को तनावग्रस्त परफेक्शनिस्ट बना देता है।
भावनाओं को दें मान्यता
टेली मानस के काउंसलर दिनेश कुमार का कहना है कि अक्सर पेरेंट्स बच्चों के दुख या गुस्से को नजरअंदाज कर देते हैं। भावनाओं को दबाने से बच्चे बड़े होकर खुद पर शक करने लगते हैं। यह जरूरी नहीं कि आप बच्चे की हर बात से सहमत हों, लेकिन उसकी उदासी या गुस्से को नॉर्मल मानकर उसे समझना जरूरी है ताकि वह अपनी सहज बुद्धि पर भरोसा करना सीख सके।
बच्चों पर न डालें पैरेंटिफिकेशन का बोझ
बरेली कॉलेज की मनोवैज्ञानिक डॉ. हेमा खन्ना ने एक गंभीर स्थिति पैरेंटिफिकेशन पर प्रकाश डाला। जब बच्चे अपने पेरेंट्स की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने या उनके तनाव को कम करने में लग जाते हैं। तो वे अपना बचपन खो देते हैं। ऐसे बच्चे अपनी खुशी से पहले दूसरों का चेहरा पढ़ना शुरू कर देते हैं। बच्चों को संवेदनशील बनाएं। लेकिन उन्हें बड़ों की उलझनों का हिस्सा न बनाएं। वह कहती हैं कि अति-सुरक्षात्मक रवैया बच्चों को अपाहिज बना देता है। वह सलाह देती हैं कि होमवर्क व्यवस्थित करने या दोस्तों के छोटे-मोटे झगड़ों में माता-पिता को तुरंत हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उन्हें कहना चाहिए कि चलो मिलकर सोचते हैं कि इसके क्या विकल्प हो सकते हैं। इससे बच्चों में दबाव में काम करने का आत्मविश्वास पैदा होता है। सकारात्मक आंतरिक संवाद खोखले वादे जैसे तुम महान हो बच्चों को असल दुनिया के लिए तैयार नहीं करते। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को खुद से बात करना सिखाएं। उन्हें सिखाएं कि वे कहें कि यह काम मुश्किल है, पर मैं कोशिश कर सकता हूं। यह आंतरिक संवाद उन्हें मुश्किल समय में टूटने से बचाता है।
