‘वेंटिलेटर’ पर ट्रॉमा सिस्टम: केजीएमयू में स्ट्रेचर पर इलाज, पीजीआई में खाली पड़े बेड
राजधानी की दो बड़ी संस्थाओं में तालमेल का अभाव, बदइंतजामी का खामियाजा भुगत रहे गंभीर मरीज
लखनऊ, अमृत विचार : राजधानी की ट्रॉमा चिकित्सा व्यवस्था बदइंतजामी और लापरवाही की शिकार होती जा रही है। एक ओर केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में मरीजों का दबाव इतना बढ़ चुका है कि 400 बेड हमेशा फुल रहते हैं, वहीं 100 से ज्यादा मरीज स्ट्रेचर पर भर्ती होकर इलाज कराने को मजबूर हैं। दूसरी ओर एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के कई वार्डों में बेड खाली पड़े हैं। न्यूरो सर्जरी वार्ड तक में बेड उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। राजधानी के दोनों बड़े सरकारी संस्थानों के बीच तालमेल की कमी का सीधा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में हालात इतने खराब हैं कि एक-एक बेड के लिए मारामारी मची हुई है। गंभीर मरीज घंटों इमरजेंसी में इंतजार करने को मजबूर हैं। कई मरीजों का इलाज स्ट्रेचर पर ही किया जा रहा है। तीमारदारों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन बढ़ती मरीज संख्या के मुकाबले कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। डॉक्टर और स्टाफ लगातार दबाव में काम कर रहे हैं, लेकिन मरीजों को राहत नहीं मिल रही है।
वहीं दूसरी तरफ एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यहां कई वार्डों में बेड खाली पड़े हैं। हालत यह है कि मरीज और उनके परिजन बेड की तलाश में पीजीआई मुख्य परिसर की इमरजेंसी और एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के बीच दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एसजीपीजीआई में बेड उपलब्ध हैं तो केजीएमयू से मरीजों को व्यवस्थित तरीके से रेफर क्यों नहीं किया जा रहा है। दोनों संस्थानों के बीच बेड समन्वय और रेफरल की कोई प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आती है। इसका नतीजा यह है कि गंभीर मरीज समय पर मुकम्मल इलाज से वंचित रह जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि केजीएमयू और एसजीपीजीआई के बीच रियल टाइम बेड मैनेजमेंट और समन्वित रेफरल सिस्टम लागू कर दिया जाए तो गंभीर मरीजों को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस दिशा में ठोस पहल करते नजर नहीं आ रहे हैं।
ट्रॉमा व्यवस्था की यह अव्यवस्था गंभीर घायलों और इमरजेंसी मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। समय पर बेड और इलाज न मिलना राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रभारी आर. हर्षवर्धन ने बताया कि 80-90 फीसदी बेड भरे रहते हैं, सभी को मुकम्मल इलाज मुहैया कराया जाता है।
