World Menstrual Hygiene Day 2026: कम उम्र में पीरियड्स... 8-10 साल की बच्चियों पर बढ़ता खतरा, जागरूकता सबसे बड़ी जरूरत
लखनऊ, अमृत विचारः मासिक धर्म या माहवारी स्त्री जीवन की एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है। यह केवल शरीर में होने वाला परिवर्तन नहीं, बल्कि एक लड़की के किशोरावस्था की ओर बढ़ने का संकेत भी है। प्रकृति ने स्त्री को मातृत्व की क्षमता प्रदान की है और माहवारी उसी प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। इसके बावजूद समाज में आज भी इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती। संकोच, मिथक और जानकारी के अभाव ने इसे एक सामान्य स्वास्थ्य विषय के बजाय शर्म और झिझक का विषय बना दिया है। यही कारण है कि हर वर्ष 28 मई को विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस मनाकर लोगों को इसके प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है।
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क्यों मनाया जाता है विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस
विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस की शुरुआत वर्ष 2014 में जर्मनी की संस्था ‘वॉश यूनाइटेड’ द्वारा की गई थी। 28 मई की तारीख प्रतीकात्मक रूप से चुनी गई, क्योंकि सामान्यतः माहवारी 28 दिनों के चक्र में आती है और लगभग 5 दिन तक रहती है। इस दिवस का उद्देश्य माहवारी से जुड़े मिथकों को दूर करना, स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाना और किशोरियों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना है। आज दुनियाभर में इस दिन जागरूकता अभियान, स्वास्थ्य शिविर, कार्यशालाएं और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
जानकारी के अभाव से बढ़ती परेशानियां
समाज में माहवारी को लेकर सबसे बड़ी समस्या जानकारी का अभाव है। आज भी अनेक घरों में बेटियों से इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती। जब किसी बच्ची को पहली बार माहवारी आती है, तो वह घबरा जाती है। शरीर में होने वाले अचानक बदलाव, दर्द और रक्तस्राव उसे असहज कर देते हैं। कई बच्चियां इसे बीमारी या किसी गंभीर समस्या के रूप में देखने लगती हैं। उन्हें केवल इतना बता दिया जाता है कि हर महीने कुछ दिनों तक पैड या कपड़े का इस्तेमाल करना है। इसके आगे की वैज्ञानिक जानकारी, मानसिक सहयोग और भावनात्मक समझ प्रायः नहीं दी जाती।
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नई सामाजिक चिंता
इन समस्याओं के बीच एक नई चिंता तेजी से सामने आ रही है। कम उम्र में माहवारी की शुरुआत। पहले जहां सामान्यतः 13 से 15 वर्ष की आयु में माहवारी शुरू होती थी, वहीं अब 8 से 10 वर्ष की बच्चियां भी इससे गुजर रही हैं। यह बदलाव केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी कई नई चुनौतियां लेकर आया है। छोटी उम्र में बच्चियां उन शारीरिक परिवर्तनों का सामना करने लगती हैं, जिन्हें समझने की मानसिक परिपक्वता उनमें अभी विकसित नहीं होती।
बचपन पर बढ़ता मानसिक दबाव
कम उम्र में माहवारी आने से बच्चियों पर अचानक जिम्मेदारियों और सावधानियों का बोझ बढ़ जाता है। उन्हें हर महीने दर्द, असहजता, स्वच्छता बनाए रखने और दाग-धब्बों से बचने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बच्चियां इस दौरान तनाव और डर महसूस करती हैं। कुछ मामलों में पीरियड्स के दर्द और मानसिक दबाव का असर इतना अधिक होता है कि बच्चियां अवसाद जैसी स्थिति में पहुंच जाती हैं। यह स्थिति समाज और परिवार दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
ग्रामीण क्षेत्रों की चुनौतियां
ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में स्थिति और भी गंभीर है। वहां आज भी अनेक किशोरियां स्वच्छ सैनिटरी पैड तक आसानी से नहीं पहुंच पातीं। कई बार पुराने कपड़ों का अस्वच्छ तरीके से उपयोग किया जाता है, जिससे संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। माहवारी के दौरान साफ-सफाई, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों की जानकारी का अभाव लड़कियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करता है।
परिवार, विद्यालय की जिम्मेदारी
ऐसे समय में परिवार, विद्यालय और समाज की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ जाती है। बच्चियों को डराने या केवल पाबंदियां लगाने के बजाय उन्हें सहज और वैज्ञानिक तरीके से समझाना जरूरी है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटियों से खुलकर बात करें और उनके सवालों का धैर्यपूर्वक उत्तर दें। विद्यालयों में किशोर स्वास्थ्य और माहवारी स्वच्छता पर नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। लड़कों को भी इस विषय के प्रति संवेदनशील बनाना आवश्यक है, ताकि वे इसे मजाक या शर्म का विषय न समझें।
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बदलती जीवनशैली और डिजिटल प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जीवनशैली, फास्ट फूड, हार्मोनयुक्त खाद्य पदार्थ, शारीरिक गतिविधियों में कमी और डिजिटल माध्यमों का बढ़ता प्रभाव इस बदलाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। आज बच्चे बहुत कम उम्र में मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के संपर्क में आ जाते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील और अनुपयुक्त सामग्री उनके मानसिक विकास को प्रभावित कर रही है। किशोरावस्था से पहले ही बच्चों में जिज्ञासा और भावनात्मक बदलाव तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि उन्हें सही दिशा देने वाला संवाद अक्सर परिवारों में अनुपस्थित होता है।
हार्मोनल बदलाव और बढ़ती जिज्ञासाएं
माहवारी केवल रक्तस्राव नहीं, बल्कि हार्मोनल बदलावों की एक प्रक्रिया भी है। इसके साथ शरीर और मन दोनों में परिवर्तन आते हैं। यदि बच्चियों को इन परिवर्तनों के बारे में सही जानकारी न मिले, तो वे भ्रमित हो सकती हैं। कई बार जिज्ञासा, दबाव या गलत संगत के कारण बच्चे ऐसे कदम उठा लेते हैं, जिनके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हाल के वर्षों में कम उम्र की बच्चियों के गर्भवती होने जैसी घटनाएं समाज को झकझोर रही हैं। यह केवल कानून या अपराध का विषय नहीं, बल्कि जागरूकता और संवाद की कमी का भी परिणाम है।
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स्वच्छता का महत्व
माहवारी के दौरान स्वच्छता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। सैनिटरी पैड या स्वच्छ कपड़े का सही उपयोग, समय-समय पर परिवर्तन, साफ-सफाई और पर्याप्त पानी पीना जरूरी होता है। संतुलित भोजन, आयरन युक्त आहार और हल्का व्यायाम या योग दर्द और कमजोरी को कम करने में सहायक होते हैं। इसके साथ मानसिक सहयोग भी उतना ही आवश्यक है। बच्चियों को यह महसूस कराना चाहिए कि माहवारी कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि स्वस्थ स्त्री जीवन का सामान्य हिस्सा है।
मिथकों को तोड़ने की जरूरत
समाज में आज भी माहवारी को लेकर अनेक मिथक प्रचलित हैं। कहीं लड़कियों को रसोई में जाने से रोका जाता है, कहीं मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी होती है और कहीं उन्हें अलग रहने के लिए मजबूर किया जाता है। इन मान्यताओं से बच्चियों के मन में हीनभावना पैदा होती है। आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जाए और माहवारी को सामान्य स्वास्थ्य विषय की तरह स्वीकार किया जाए।
जागरूक और संवेदनशील समाज ही सुरक्षित भविष्य
विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि समाज को संवेदनशील और जागरूक बनाने का अभियान है। यह हमें याद दिलाता है कि बेटियों को सही जानकारी, सुरक्षित वातावरण और सम्मान देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार मिलकर इस दिशा में काम करें, तो बच्चियां न केवल स्वस्थ रहेंगी, बल्कि आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ा सकेंगी।
--इंदु सिंह, लेखिका
