Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो एनाउंसर से 'मदर इंडिया' के महानायक बनने का सफर, जानिए जीवन के वो किस्से जो आप नहीं जानते

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

मुंबई। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त ने अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई, लेकिन फिल्मी दुनिया में आने से पहले उन्होंने रेडियो सीलोन में एनाउंसर के तौर पर भी काम किया था, जहां उन्हें प्रत्येक साक्षात्कार के लिए 25 रुपये मिलते थे।

सुनील दत्त का जन्म 06 जून 1929 को पंजाब के झेलम जिले के खुर्दी गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता रघुनाथ दत्त दीवान बड़े जमींदार थे। जब सुनील दत्त मात्र पांच वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। 

वर्ष 1947 में देश विभाजन के दौरान हुए दंगों के बाद उनका परिवार पूर्वी पंजाब के यमुनानगर आ गया, जो अब हरियाणा में है। कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया और वहीं पढ़ाई की। बाद में उन्होंने मुंबई के जय हिंद कॉलेज में दाखिला लिया। पढ़ाई के दौरान वह मुंबई के बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रूप में भी कार्य करते थे, जहां उन्हें 120 रुपये मासिक वेतन मिलता था। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रेडियो सीलोन में नौकरी की। 

इस दौरान वह कई कार्यक्रम तैयार करते थे और मशहूर अभिनेत्री नरगिस का इंटरव्यू भी लिया। रेडियो पर वह 'लिप्टन की महफिल' नामक कार्यक्रम का संचालन करते थे। वर्ष 1953 में फिल्म शिकस्त के सिलसिले में अभिनेता दिलीप कुमार का इंटरव्यू करते समय उनकी मुलाकात निर्देशक रमेश सहगल से हुई।

रमेश सहगल उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने सुनील दत्त को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया। बाद में अपनी अगली फिल्म के लिए उन्हें 300 रुपये पारिश्रमिक देने का प्रस्ताव दिया।हालांकि, सुनील दत्त ने अपनी मां को पढ़ाई पूरी करने का वचन दिया था। 

उन्होंने सहगल से साफ कहा कि वह मां के वचन के कारण तत्काल फिल्म नहीं कर पाएंगे। उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर सहगल ने कहा कि पहले वह पढ़ाई पूरी करें, फिर फिल्म शुरू की जाएगी। इसके बाद वर्ष 1955 में उन्होंने सहगल की फिल्म रेलवे प्लेटफार्म से अभिनय की शुरुआत की। वर्ष 1955 से 1957 तक उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष किया। 

संघर्ष की कहानी 

इस दौरान उन्होंने कुंदन, राजधानी, किस्मत का खेल और पायल जैसी कई फिल्मों में काम किया, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। उनके करियर में बड़ा मोड़ वर्ष 1957 में प्रदर्शित मदर इंडिया से आया। इस फिल्म में उन्होंने नकारात्मक नायक की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने काफी सराहा। फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री नरगिस आग की लपटों में घिर गई थीं। उस समय सुनील दत्त ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें बचाया। इस घटना के बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बाद में उन्होंने विवाह कर लिया। 

वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ये रास्ते हैं प्यार के से उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। वर्ष 1964 में प्रदर्शित यादें उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी। वर्ष 1967 उनके करियर का अहम साल साबित हुआ, जब मिलन, मेहरबान और हमराज़ जैसी सफल फिल्में प्रदर्शित हुईं। वर्ष 1972 में उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म रेशमा और शेरा का निर्माण और निर्देशन किया, लेकिन यह फिल्म टिकट खिड़की पर सफल नहीं हो सकी। 

बाद में वर्ष 1981 में उन्होंने अपने पुत्र संजय दत्त को लॉन्च करने के लिए रॉकी का निर्देशन किया, जो सुपरहिट साबित हुई। फिल्मों में सफलता पाने के बाद सुनील दत्त ने राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई और कांग्रेस पार्टी से लोकसभा सदस्य बने। वर्ष 1968 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वर्ष 1982 में उन्हें मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों में भी काम किया, जिनमें मन जीत जग जीत, दुख भंजन तेरा नाम और सत श्री अकाल प्रमुख हैं। वर्ष 1993 में प्रदर्शित क्षत्रिय के बाद उन्होंने लंबे समय तक फिल्मों से दूरी बनाई। 

बाद में निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा के आग्रह पर उन्होंने वर्ष 2003 में प्रदर्शित मुन्ना भाई एमबीबीएस में अपने पुत्र संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद किया। सुनील दत्त को अपने करियर में दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इनमें मुझे जीने दो और खानदान शामिल हैं। वर्ष 2005 में उन्हें दादा साहब फाल्के रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लगभग 100 फिल्मों में अभिनय करने वाले सुनील दत्त ने 25 मई 2005 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

ये भी पढ़ें  : 
Prime Video: सोनाक्षी सिन्हा और ज्योतिका की 'System' ने ओटीटी पर मचाया धमाल, जानिए क्यों ट्रेंड कर रही फिल्म

संबंधित समाचार