धैर्य में कमी से दरक रहे वैवाहिक रिश्ते

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Published By Deepak Mishra
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आपसी समझ व धूमधाम से की गई शादियां असमय दम तोड़ दे रही हैं। लगभग 40 से 50 प्रतिशत मामले विवाह के शुरुआती एक से तीन वर्षों के भीतर ही कोर्ट में पहुंच जा रहे हैं।

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अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ

 

आधुनिकता व भौतिकवादी सोच की आड़ में परंपराएं व संस्कृति अपने को पार्श्व में पाने लगी हैं। आर्थिक-सामाजिक व वैचारिक स्वतंत्रता समाज के मूल्यपरक बुनियादी ढांचे को प्रभावित करने लगी हैं। युवाओं की सोच समाज को नई दिशा तो देती है, किंतु विचारों में भटकाव के कारण समाज की दशा बिगाड़ रही हैं। आय के बढ़ते स्रोत, बाजारीकरण, मनमौजीपन तथा संकुचित सोच ने समाज को अपनी आगोश में ले लिया है। व्यावसायिक शिक्षा, बढ़ते सेवा क्षेत्र, बनावटीपन, उदारीकरण तथा तकनीकी क्रांति ने आज युवाओं को जकड़ सा लिया है। 

धन कमाने की चाह में वे जीवन मूल्य भूल गए हैं। फलस्वरूप कई तरह की सामाजिक व्याधियों ने उन्हें रुग्ण बना दिया है। दांपत्य जीवन में बिखराव उसी का परिणाम है। इस संदर्भ में व्यावसायिक शिक्षा, बढ़ती आमदनी व इंटरनेट मीडिया वरदान की जगह अभिशाप बनती दिख रही है। देश में बढ़ता तलाक दर समाज के लिए कलंक सरीखा ही। कुछ लोग इसे एक सकारात्मक संकेत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता व समानता की दिशा में एक कदम भले ही मान लें, लेकिन रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, युवा दंपति दबाव नहीं झेल पा रहे, आसानी से हार मानकर अलग हो रहे हैं। देश में तलाक की बढ़ती दरें वास्तव में क्या दर्शा रही हैं? ये प्रगति का संकेत हैं या हमें वास्तव में चिंतित हो जाना चाहिए? 

हमारे देश में विवाह को एक आजन्म कर्तव्य माना जाता था, जिसे अक्सर परिवार द्वारा सामाजिक और आर्थिक स्थिरता पर अधिक ध्यान देते हुए तय किया जाता था, न कि भावनात्मक अनुकूलता पर। नव वर-वधुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि अपनी संस्कृति व परंपरा का निर्वहन करते हुए प्रत्येक परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ ही रहें, लेकिन क्या अब ऐसा हो पा रहा है? आपसी समझ व धूमधाम से की गई शादियां आज क्यों असमय दम तोड़ दे रही हैं? लगभग 40 से 50 प्रतिशत मामले विवाह के शुरुआती एक से तीन वर्षों के भीतर ही कोर्ट में पहुंच जा रहे हैं।

सामाजिक आधिकारिता मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में प्रतिदिन करीब 300 तलाक के मामले दर्ज किए जाते हैं। शादी के पहले ही वर्ष में करीब 18 प्रतिशत तलाक हो जा रहे हैं। बीते दो दशकों में तलाक के मामलों में करीब 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है। आंकड़े बताते हैं कि अब करीब 58 प्रतिशत मामलों में महिलाएं स्वयं तलाक की पहल कर रही हैं। औसतन 31 वर्ष की महिलाएं और 36 वर्ष के पुरुष तलाक लेने में आगे हैं। लगभग 23 प्रतिशत मामलों में क्रूरता व 14 प्रतिशत में घरेलू हिंसा तलाक के प्रमुख कारक हैं। शादी के पहले तीन वर्षों में सबसे अधिक रिश्ते टूट रहे हैं। 25 से 34 वर्ष आयु वर्ग में तलाक की याचिकाएं अधिक देखी जा रही हैं। 

विवाह तो सहभागिता, प्रेम व आपसी सम्मान के माले में गूंथा सामाजिक बंधन होता है। आखिर क्या कारण है कि यह पवित्र बंधन कुछ ही दिनों में बिखर जा रहा है?  इसके लिए कोई एक कारक ही जिम्मेदार तो नहीं हो सकता। संयुक्त परिवार त्याग, धैर्य, सामंजस्यता, एका तथा आपसी समझ का अप्रतिम उदाहरण माना है। इसमें परंपराओं व मर्यादाओं के उल्लंघन के लिए कोई स्थान नहीं होता। सामजिक दबाव भी गलत कृत्य को रोकने में भूमिका अदा करता है। यही कारण रहा कि पहले की शादियों का निर्वहन आजन्म होता था।

एकल परिवार की अवधारणा व मजबूत ढांचे ने आधुनिक शादियों को असमय तितर-बितर करने में महती भूमिका निभाई है। आज के अधिकांश नव दंपतियों में न सहन शक्ति रह गई है, न ही समाज का कोई दबाव या भय। जैसे-जैसे महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं, वे आर्थिक निर्भरता के कारण नाखुश और शादियों में रहने के लिए विवश महसूस नहीं करतीं। पहले, पुरुषों को मुख्य रूप से कमाने वाला माना जाता था, जबकि महिलाओं से घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने की अपेक्षा की जाती थी। अब, दोनों साथी आर्थिक रूप से योगदान दे रहे हैं, जिससे घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करने की अपेक्षा बढ़ गई है। 

इन नई भूमिकाओं के साथ तालमेल बिठाना तलाक की बढ़ती संख्या में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों में से एक है। भारत में तलाक अब केवल अलगाव नहीं, बल्कि तथाकथित बदलते समाज का प्रतीक है। जहां लोग पुराने सामाजिक मानदंडों के बजाय खुशी, समानता व व्यक्तिगत विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। तलाक शब्द जो एक समय भारतीय समाज में गाली मानी जाती थी, आज फैशन समझा जाने लगा है। हमारे समाज में नव दंपतियों के मध्य तलाक दर में वृद्धि, आधुनिकता व पारंपरिक मूल्यों के टकराव को दर्शाती है।

तलाक की बढ़ती प्रवृत्ति ने शहरों को जकड़न में ले रखा है। विशेषतया 20-35 वर्ष के युवाओं के बीच तो तलाक लेने की होड़ लगी है। युवा अब सामाजिक दबाव या केवल 'शादी निबाहने' के पारंपरिक दृष्टिकोण को नकारते दिख रहे हैं। वे व्यक्तिगत खुशी, मानसिक स्वास्थ्य व जीवन की गुणवत्ता को अधिक महत्व देने लगे हैं। 25 से 50 वर्ष की उम्र वाले दंपतियों में अलगाव का एक सबसे बड़ा कारण अविश्वास व आपसी समरसता का अभाव भी है। पति-पत्नी के रिश्ते के साथ आने वाली जिम्मेदारियों के कारण लोग एक-दूसरे को समय नहीं दे पाते हैं, जो बाद में दूरियों का कारण बनती है।  

भारत में तलाक की बढ़ती दरें एक परिवर्तनशील समाज का संकेत दे रही हैं, जहां लोग पुरानी परंपराओं के बजाय खुशी, समानता व व्यक्तिगत कल्याण को प्राथमिकता दे रहे हैं। आज के अधिकांश युवा दंपति तलाक को चुनौतीपूर्ण तो मान रहे, बढ़ती स्वायत्तता और रिश्तों से जुड़ी बदलती अपेक्षाओं का भी संकेत मान रहे हैं, लेकिन एक बात तो सोलह आने सच है कि बढ़ती तलाक दरें हमारे पारंपरिक समाज के लिए हितकर तो कतई नहीं।

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