टूटने की कगार पर टीएमसी और ममता का संकट

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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टीएमसी नेतृत्व को अब इस बात का डर सता रहा है कि कहीं विभाजन के बाद उनका चुनाव चिह्न, पार्टी का नाम और दफ्तर उनसे न छिन जा

पार्टी में टूट की बढ़ती आशंका से ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी परेशान नजर आ रहे हैं और पार्टी विरोधी गतिविधियों में दो विधायकों को पार्टी से बर्खास्त कर चुके हैं।

Digvijay
दिग्विजय सिंह, कानपुर

 

पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार से पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अभी उभर भी नहीं पाईं हैं कि अब उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस विभाजन के कगार पर पहुंच गई है। न सिर्फ लोकसभा सदस्य पार्टी छोड़ने के लिए आतुर दिख रहे हैं, बल्कि कई विधायक भी सत्ता के करीब जाने को लालयित हैं। पार्टी में टूट की बढ़ती आशंका से ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी परेशान नजर आ रहे हैं और पार्टी विरोधी गतिविधियों में दो विधायकों को पार्टी से बर्खास्त कर चुके हैं। यह बर्खास्तगी उनकी परेशानी को और बढ़ाने वाली है, क्योंकि दोनों ही विधायक इस कोशिश में हैं कि दो तिहाई विधायकों का जुगाड़ कर नया दल बनाया जाए। उनकी इस मुहिम में पार्टी से नाराज चल रहे राज्यसभा सदस्य और लोकसभा सदस्य भी अंदरखाने शामिल हो गए हैं। 

15 साल से लगातार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को कतई यह भान नहीं था कि इस चुनाव में उनकी पार्टी को करारी हार मिलेगी, इसीलिए विधानसभा चुनाव में पार्टी नेताओं ने न सिर्फ भाजपा के स्थानीय नेताओं के विरुद्ध अभद्र टिप्पणियां कीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी नहीं बख्शा। अब सत्ता हाथ से गई तो वही नेता सर्वाधिक परेशान हैं, जिन्होंने अपनी जिह्वा पर चुनाव के समय काबू नहीं रखा था।  ऐसे नेता जो पार्टी से तौबा तो करना चाहते थे, लेकिन किन्हीं कारणों से सत्ता के करीब रहना उनकी मजबूरी थी, वे अब पार्टी छोड़ने को आतुर दिख रहे हैं, इसीलिए वे न सिर्फ पार्टी मुखिया ममता बनर्जी के विरुद्ध मुखर होकर आवाज बुलंद कर रहे हैं, बल्कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भी गुंदागर्दी को बढ़ावा देने और कट मनी की वसूली करने वालों को शह देने का आरोप मढ़ रहे हैं। सांसद काकोली घोष ने तो पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। 

पार्टी से बर्खास्त किए गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा अब इस मुहिम में लग गए हैं कि कैसे दो तिहाई विधायक उनके साथ आएं, इसीलिए उन्होंने होटल गेटवे में बैठक की, तो करीब 50 विधायक उनसे मिलने पहुंचे। पिछले दिनों ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई बैठक में 80 में से 20 विधायक ही पहुंचे थे। ऐसे में बनर्जी को मीटिंग रद्द करनी पड़ी थी। इसी कार्रवाई के बाद ही ममता ने दोनों विधायकों को पार्टी से बर्खास्त किया। माना जा रहा है कि इनके कहने पर ही ज्यादातर विधायक बैठक में नहीं गए, हालांकि ममता बनर्जी और उनके सहयोगी नाराज विधायकों को मनाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं। 

80 में से 54 विधायक यदि पार्टी छोड़ देते हैं, तो फिर वे नया दल बना सकते हैं। इससे उनकी सदस्यता भी नहीं जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाले राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता के करीब रहने के लिए संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी आसानी से इस संख्याबल का जुगाड़ कर लेंगे। टीएमसी के 29 लोकसभा सदस्यों में 20 सांसद भी नाराज बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही राज्यसभा के 11 में से आधा दर्जन सांसदों से भी नाराज विधायक और लोकसभा सदस्य संपर्क साध रहे हैं। 

टीएमसी नेतृत्व को अब इस बात का डर सता रहा है कि कहीं विभाजन के बाद उनका चुनाव चिह्न, पार्टी का नाम और दफ्तर उनसे न छिन जाए। टीएमसी में यदि टूट होती है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा, क्योंकि अलग हुए सांसद, विधायक उसे समर्थन दे सकते हैं। लोकसभा के साथ ही राज्ययभा में भी उसकी स्थिति मजबूत होगी। इसके साथ ही टीएमसी के कमजोर होने का लाभ कांग्रेस और वामदल भी उठाने की कोशिश करेंगे। इससे उनको अपने संगठन को मजबूती देने में आसानी होगी। 

नगर निकायों से जुड़े पार्षद भी टीएमसी छोड़ रहे हैं, हालांकि इससे भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं और नेताओं में बेचैनी है। उन्हें लगता है कि टीएमसी में रहकर जिन्होंने उन पर अत्याचार किया। कहीं ऐसा न हो कि वे भाजपा में शामिल हो जाएं और उन्हें उनकी जय- जयकार करनी पड़े, हालांकि यहां भाजपा को भी संभल कर कदम उठाने होंगे। पार्टी अगर ऐसे लोगों को साथ जोड़ती है, तो कार्यकर्ता नाराज होगा और शांत होकर घर बैठ जाएगा। इसके साथ ही आम मतदाता भी पार्टी से नाराज होगा, क्योंकि जिनसे निजात पाने के लिए उसने भाजपा को वोट दिया, वे ही भाजपा का झंडा उठाए घूमेंगे तो उन पर कोई कार्रवाई भी नहीं हो पाएगी। 

ऐसा नहीं लगता कि भाजपा उन्हें अपने दल में शामिल करने की गलती करेगी। पिछले दिनों अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के आरोप में जिन्हें गिरफ्तार किया गया वे टीमएसी के ही कार्यकर्ता निकले, जो यह बताने के लिए काफी है कि सत्ता जाने के लिए वे अपने ही नेता को जिम्मेदार मानते हैं। अभिषेक बनर्जी ही क्यों 24 परगना जिले में सांसद सौगत रॉय पर अंडा फेंकने की घटना हुई और सांसद कल्याण बनर्जी पर भी कथित रूप से हमला यह दर्शाता है कि टीएमसी के विरुद्ध पश्चिम बंगाल में जबरदस्त आक्रोश है। 

विपक्ष भले ही विधानसभा चुनाव में भाजपा पर बेइमानी का आरोप लगाए, लेकिन ये घटनाएं बताती हैं कि टीएमसी से वहां के मतदाता ऊब चुके थे। यह बात टीएमसी के सांसदों, विधायकों को भी पता है, इसीलिए वे जनता के आक्रोश से बचने के लिए अब या तो अलग दल बनाने की सोच रहे हैं अथवा पार्टी नेतृत्व के विरुद्ध सार्वजनिक मंचों पर तीखी टिप्पणियां करके खुद को पाक साफ बताने की कोशिश कर रहे हैं।

यह टूट टीएमसी के लिए भारी पड़ेगी, क्योंकि ममता बनर्जी अब स्थिति में नहीं होंगी कि वह आसानी से पूरे प्रदेश में संगठन को मजबूती से खड़ा कर सकें। इसके साथ ही इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व करने का उनका सपना भी टूटेगा। साथ ही वह चाहकर भी राज्यसभा में भी नहीं जा पाएंगी, क्योंकि उनके पास विधायकों का इतना संख्या बल भी नहीं होगा कि वह जीत सकें। भाजपा दूर से बैठकर टीएसी में बगावत का तमाशा देख रही है। उसे भी पता है कि टीएमसी में टूट होगी तो विपक्ष कमजोर होगा और आसानी से वह सरकार चला सकेगी।

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