गोदना कला ने बदली पीढ़ियों की तकदीर
मिथिला चित्रकला से जो लोग भी परिचित हैं, वे गोदना शैली से भी भलीभांति अवगत हैं। मेरा परिचय शैली से थोड़ा ही है। इसे पूरी तरह जानने-समझने के लिए जिस तरह के शोध की आवश्यकता है। मैं उसके लिए पर्याप्त समय कभी नहीं निकाल पाया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन, पटना की गतिविधियों से जुड़े रहने की वजह से लोक कलाकारों से मिलना-जुलना बना रहता है। ऐसे ही एक आयोजन के क्रम में रांची में पहली बार मुलाकात हुई युवा कलाकार संतोष पासवान से। संतोष गोदना चित्रशैली में काम करते हैं। उनसे बातचीत के क्रम में यह तथ्य सामने आया कि गोदना शैली में काम करने वाले पासवान समुदाय के ज्यादातर कलाकार एक खास परिवार से आते हैं।
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विदित हो कि मिथिला में “गोदना” शैली के चित्रों के निर्माण की कहानी शुरू होती है जर्मन मानवशास्त्री एरिका मोजर की प्रेरणा से, जिन्होंने पासवान समुदाय की महिलाओं को शरीर पर अंकित गोदना (टैटू) को कागज पर उतारने को प्रेरित किया। संतोष से बातचीत में जो नई जानकारी मेरे सामने आई, वह बेहद चौंकाने वाली थी। कम-से-कम मेरे लिए तो बिल्कुल नई और लगभग अविश्वसनीय। जानकारी यह थी कि इस शैली में काम करने वाले कलाकारों का एक वृहत परिवार ऐसा भी है, जिसमें दो सौ से ज्यादा ऐसे कलाकार हैं, जो नियमित तौर पर चित्र रचना में संलग्न हैं।
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अगर इस परिवार के सदस्यों द्वारा कला जगत में हासिल उपलब्धियों की बात की जाए तो यहां दो पद्मश्री से सम्मानित सदस्य हैं, वहीं राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित पांच और राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों की संख्या पच्चीस है। इस परिवार की वंशावली पर जाएं, तो पता चलता है कि मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव में ढोलाई पासवान और चुल्हाई पासवान का यह कुनबा आज लगभग हज़ार से ज्यादा सदस्यों वाला हो चुका है। अगर इसे घरों में बांटा जाए, तो कुल पैंतीस घर इस कुनबे में शामिल हैं। ऐसे में कभी शरीर पर बनाए जाने वाले इस गोदने (टैटू) को कागज पर सबसे पहले उतारने का श्रेय जाता है बिंदा देवी, पति -स्व. कारी पासवान के हिस्से।
यहां से जिस सिलसिले की शुरुआत होती है, उसकी अगली कड़ी में नाम आता है स्व. चानो देवी का, जिनके पति थे स्व. रौदी पासवान। वर्ष 1984/85 में राज्य पुरस्कार से सम्मानित चानो देवी को 2007 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त होता है। यह सिलसिला आगे बढ़ता ही रहता है और 1984/85 में ही स्व. रामपरी देवी, पति-स्व. स्वरुप लाल पासवान और स्व. भालेश्वरी देवी, पति- स्व. रीतलाल पासवान राज्य पुरस्कार से सम्मानित होती हैं। इसके बाद का यह सिलसिला अनवरत जारी रहता है और इस क्रम में पांचवा नाम आता है स्व. तारा देवी, पति- स्व. जयलाल पासवान का।
इनके अलवा इस तरह अनेक लोग हैं, जिसमें पति-पत्नी, पिता-पुत्र से लेकर बेटी-बहू भी शामिल हैं। ऐसे में जहां तक अपनी जानकारी है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि संभवतः यह पूरे देश में एकलौता उदाहरण है, जहां परिवार की चौथी पीढ़ी तक आते-आते कलाकारों की संख्या 200 से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में यह उदाहरण जहां कला में रोजगार की संभावनाओं को उजागर करती है, साथ ही उस लोक जीवन की उस कलाधारा को भी अक्षुण्ण बनाए रखती है, जो सदियों से हमारे समाज में अनवरत प्रवाहमय है।
-सुमन कुमार सिंह
