विश्व पर्यावरण दिवस: बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट जलवायु परिवर्तन की बन रहा बड़ी वजह
पर्यावरण संकट से पृथ्वी की जैव विविधता, परिस्थितिकी तंत्र सहित पूरी मानवता प्रभावित
डॉ. मणिंद्र ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण के बिगड़ते हालातों में 45 फीसदी योगदान ग्रीन हाउस गैसों का है, जो सीधे तौर पर जैव विविधता को प्रभावित करती हैं। औसतन कॉर्बन फुटप्रिंट (मानव गतिविधियों से निकलने वाला कार्बन) में हर वर्ष तेजी से इजाफा हो रहा है।
मृगांक मौली, पंतनगर। हमारी पृथ्वी, हमारा भविष्य है, इस पर बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जो जलवायु परिवर्तन का कारण है। नतीजन पृथ्वी की जैव विविधता, परिस्थितिकी तंत्र सहित मानवता भी प्रभावित हो रही है। यह बात उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन ने विश्व पर्यावरण दिवस के परिप्रेक्ष्य में कही।
45 फीसदी ग्रीन हाउस गैसें जिम्मेदार
डॉ. मणिंद्र ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण के बिगड़ते हालातों में 45 फीसदी योगदान ग्रीन हाउस गैसों का है, जो सीधे तौर पर जैव विविधता को प्रभावित करती हैं। औसतन कॉर्बन फुटप्रिंट (मानव गतिविधियों से निकलने वाला कार्बन) में हर वर्ष तेजी से इजाफा हो रहा है। जिसका मुख्य कारण तकनीकी आधारित सयंत्रों का अत्यधिक उपयोग, विलासितापूर्ण जीवन व प्रकृति आधारित समाधानों को दरकिनार करना है। बताया कि भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट लगभग 0.56 टन प्रतिवर्ष है।
अंधाधुंध कटान निकाल रहा पर्यावरण की जान
बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट के कारण पृथ्वी पर मौजूद जल, जंगल व जमीन आवश्यकता से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने में असमर्थ हो रहे हैं। नतीजन कार्बन पर्यावरण में फैल कर पृथ्वी पर तापमान को बढ़ा रहे हैं, जो सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है। जलवायु परिवर्तन के अन्य कारणों में वनों का अंधाधुंध कटान, वनाग्नि, जलस्रोतों का सुखना, परंपरागत ज्ञान को महत्त्व न देना, विदेशी पादप प्रजातियों का व्यापक दखल और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां हैं।
प्रजातियों के प्रजनन में आ रही कमी
डॉ. मणिंद्र ने बताया कि बढ़ते जलवायु परिवर्तन के कारण जीवों और पादपों के प्रजातियों में प्राकृतिक रूप से संवर्धन और प्रजनन में कमी देखने को मिल रही है। साथ ही जैव विविधता का सामंजस्य और स्वरूप भी बिगड़ रहा है। लिहाजा ज्यादातर प्रजातियां संकटग्रस्त एवं विलुप्तप्रायः श्रेणी में आ रहीं है। बढ़ते जनघनत्व के कारण आबादी व जंगलों के दरम्यान फासले कम हो रही है, जिससे जैव विविधता सिमट रही है। जनघनत्व में इजाफा से खाद्यान्न व अन्य आवश्यकताओं की बढ़ती मांग ने जैव विविधता को बिखेरने में अपनी महती भूमिका निभा रहा है।
विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास
पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण को ध्यान में रखते हुए विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में दुनिया भर में मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1972 मे क़ी थी। विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन स्टॉकहोम (स्वीडन) मे आयोजित किया गया था। जिसमें 119 देशो के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया था। प्रथम सम्मेलन 5 जून से 16 जून तक चला जिसके बाद 5 जून 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। इसके बाद प्रतिवर्ष पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाता है। इस वर्ष इसकी मेजबानी अजरबैजान गणराज्य कर रहा है।
