छोटी बड़ी लकीर: रिश्तों के संतुलन और मर्यादा की एक अनूठी लघुकथा

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Published By Muskan Dixit
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सुनील श्रीवास्तव “मासूम”, मुरादाबादः साड़ियां दिखाते-दिखाते वृद्ध दुकानदार ने एक घंटे में उसके सामने साड़ियों का एक पहाड़ सा लगा दिया था। वो उन साड़ियों में से एक साड़ी निकालता, उसे ध्यान से देखकर और उसका मूल्य पूछने के बाद उसे एक तरफ रख देता। इस तरह उसने पांच-छह साड़ियां अलग रखने के बाद बाकी साड़ियों को अपने पास से हटवा दिया। अब वो पुनः उन साड़ियों को बारी-बारी से देखता और कुछ सोच में डूब जाता। यह सब देखकर दुकानदार के सब्र का बांध टूट चुका था। वो चिल्ला पड़ा- “भाई साहब, इनमें से कोई साड़ी पसंद आई आपको?” “हां...देखकर फाइनल करके आपको बता रहा हूं कि कौन सी लेनी है” उसके माथे पर शिकन देखकर दुकानदार ने नम्र होकर पूछा-” क्या अपनी मां के लिए साड़ी पसंद कर रहे हों?” वो एकदम से घबराकर बोला- “हां...मां के लिए”  “तो उनकी उम्र के हिसाब से यह साड़ी ठीक रहेगी और आपके बजट में भी” दुकानदार उस आदमी की हैसियत को आंककर, उन साड़ियों के बीच में से एक साड़ी उठाकर बोला। वो आदमी चुपचाप रहा। “क्या यह सोच रहे हो कि मां के लिए नई साड़ी लेकर जाओगे, तो  पत्नी क्या कहेगी?” “नहीं, ...नहीं ऐसी बात नहीं है “वो हकलाकर बोला। मन ही मन सोचने लगा कि पत्नी को बिना बताए हुए पहली बार वो बाजार से मां के लिए एक साड़ी लेने जा रहा है, पता नहीं घर पहुंचकर क्या बवाल शुरू हो जाए।  दुकानदार शायद उसकी सोंच को भापकर उसे सुझाव देने लगा- “मेरे पास एक उपाय है, ऐसा करो कि मां के लिए यह पांच सौ वाली साड़ी और पत्नी के लिए सामने शोकेश में सजी दो-तीन हजार के आसपास की कोई ब्रांडेड साड़ी ले लो। मां भी खुश और मां से महंगी साड़ी पाकर पत्नी भी खुश।” उस आदमी को दुकानदार की बात समझ में आ गई। दुकान से निकलते समय अब उसके पास साड़ियों के दो थैले थे।

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