बृहस्पति : बुद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के सर्वोच्च प्रतीक 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को देवताओं के गुरु, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें नवग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माना जाता है, जो भाग्य, धन और विस्तार (प्रगति) के कारक हैं। बृहस्पति के प्रभाव व्यापक हैं। बृहस्पति उच्च शिक्षा, दर्शन और धार्मिक ज्ञान के स्वामी हैं।

Untitled design (1)

यह शिक्षकों, सलाहकारों और मार्गदर्शकों के स्वामी हैं। यह बच्चों, विशेषकर प्रथम संतान और स्त्री की कुंडली में पति के प्रमुख कारक हैं, जैसा कि शास्त्रीय पराशरी पद्धति में देखा जाता है। यह दीर्घकालिक धन और समृद्धि के स्वामी हैं। यकृत, वसा चयापचय, प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की कोशिकीय स्तर पर वृद्धि और विस्तार की क्षमता के भी स्वामी हैं।

बृहस्पति का गुण केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता भी है: सत्य, अच्छाई और न्याय को परखने की क्षमता और आवेग, लालसा या भय के बजाय उस विवेक के आधार पर कार्य करना। कुंडली में बृहस्पति जहां भी स्थित होते हैं, वह अपने क्षेत्र को उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं। सातवें भाव में बृहस्पति केवल जीवनसाथी का संकेत नहीं देता, बल्कि यह एक बुद्धिमान, नैतिक रूप से सुदृढ़ साझेदारी की संभावना को दर्शाता है। दसवें भाव में बृहस्पति केवल करियर का संकेत नहीं देता, बल्कि यह सामाजिक कल्याण, ज्ञान या न्याय की ओर उन्मुख करियर का संकेत देता है। इसी तरह बारह भावों में उनके फल की विवेचना की जाती है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवगुरु बृहस्पति की उत्पत्ति महर्षि अंगिरा और उनकी पत्नी स्मृति (या सुरूपा) के यहां पुत्र के रूप में हुई थी। वे परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा के वंशज और देवताओं के सर्वोच्च ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।
उत्पत्ति और जन्म से जुड़ी प्रमुख कथा

तपस्या का फल:

महर्षि अंगिरा को जब काफी समय तक कोई संतान नहीं हुई, तब उन्होंने और उनकी पत्नी ने मिलकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें ‘पुंसवन’ व्रत करने का आशीर्वाद दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें तीन तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए - संवर्त, उतथ्य और जीव (जिन्हें आगे चलकर देवगुरु बृहस्पति कहा गया)

देवगुरु कैसे बने :

बचपन से ही मेधावी और शांत स्वभाव वाले ‘जीव’ ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी इस कठिन परीक्षा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ज्ञान, बुद्धि और देवताओं के सर्वोच्च गुरु (देवगुरु) का पद प्रदान किया।

सामान्य गोचर ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार बृहस्पति एक राशि में लगभग 12 महीने यानी लगभग एक वर्ष रहते हैं, परंतु अतिचारी गति के कारण कर्क राशि में 

2 जून के प्रवेश के बाद बृहस्पति 31 अक्टूबर 2026 को मेदिनीय ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार बृहस्पति का जल्दी-जल्दी राशि परिवर्तन करना, वक्री, मार्गी होना, जड़-चेतन में विशेष परिवर्तन की सूचना देता है। वर्तमान में देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि में हैं, 2 जून 2026 में देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। गौरतलब है कि बृहस्पति वर्ष 2025 में कुछ समय के लिए अपनी उच्च कर्क राशि में थे, फिर दिसंबर 2025 के प्रारंभ में कर्क राशि से लौटकर मिथुन राशि में प्रवेश कर गए। आगामी जून 2026 के प्रारंभ में मिथुन राशि से फिर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे।

2026 में बृहस्पति का मिथुन, कर्क और सिंह, तीन राशियों में गोचर बहुत लोगों का भाग्य बदल देगा। 12 राशियों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। गोचर में बृहस्पति देवता जब किसी की जन्म राशि से चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में गोचर करते हैं, तो वह समय उसे व्यक्ति के लिए कष्टप्रद होता है।

वैदिक ज्योतिष में अतिचारी चाल का अर्थ है कि बहुत तेज चलना और गुरु आने वाले 8 सालों तक यानी साल 2032 तक अतिचारी चाल चलने वाले हैं। आमतौर पर गुरु एक राशि से दूसरी राशि में जाने पर 12 से 13 महीनों का समय लगाते हैं, लेकिन इस बार गुरु एक साल में तीन बार राशि बदलने वाले हैं। ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को ज्ञान, धर्म और अर्थव्यवस्था का कारक माना जाता है। जब बृहस्पति अतिचारी (सामान्य से तेज गति) होते हैं, तो वे अपनी शुभता खोकर देश-दुनिया में तेजी से बड़े, अप्रत्याशित और उथल-पुथल भरे बदलाव लाते हैं, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, मौसम और शासन-व्यवस्था पर पड़ता है।

देश और दुनिया पर प्रभाव

अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव: अतिचारी बृहस्पति के प्रभाव से वैश्विक बाजारों और वित्तीय नीतियों में अचानक बदलाव देखने को मिल सकता है। मुद्रास्फीति और मंदी के दबाव से जनता और व्यापारिक जगत को जूझना पड़ सकता है।

प्राकृतिक और जलवायु परिवर्तन: अतिचारी गति के कारण मौसम के चक्र में अनिश्चितता आती है। असामयिक बारिश, तापमान में भारी उतार-चढ़ाव या प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल: विश्व स्तर पर सत्तातंत्र (राजाओं और राजनेताओं) पर दबाव बढ़ता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शक्ति का संतुलन बदलता है और कई देशों में आंतरिक कलह या जन-विद्रोह की स्थिति बन सकती है।

धार्मिक और सामाजिक मतभेद: अतिचारी गुरु के कारण धार्मिक मामलों में उग्रता आ सकती है। दुनियाभर में धर्म या विचारधारा को लेकर विवाद और वैचारिक टकराव बढ़ सकते हैं।

स्वास्थ्य और चिकित्सा: चिकित्सा क्षेत्र में कुछ अजीबो-गरीब बीमारियों का प्रकोप देखने को मिल सकता है, हालांकि इसके समाधान और नई दवाओं के आविष्कार भी तेजी से होंगे।

प्रलयंकारी जलवायु: 

गुरु चूंकि जीवन और शीतलता के कारक हैं, उनकी बिगड़ी चाल बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन लाएगी। कर्क राशि (जल तत्व) में उनकी स्थिति विनाशकारी बाढ़, समुद्री तूफान और जल संकट का कारण बन सकती है।

ज्ञान के नए द्वार: हर विनाश अपने साथ सृजन भी लाता है। जैसे महाभारत के बीच ‘गीता’ का जन्म हुआ, वैसे ही इस कठिन समय में आध्यात्मिक जागृति और विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी खोजें भी होंगी।

महाभारत काल की पुनरावृत्ति

इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि लगभग 5000 साल पहले महाभारत युद्ध के समय भी गुरु 7 वर्षों तक अतिचारी रहे थे। यही स्थिति प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी देखी गई थी। हाल ही में 2018 से 2022 के बीच जब गुरु अतिचारी हुए, तो पूरी दुनिया ने ‘कोरोना’ जैसी वैश्विक विभीषिका और आर्थिक मंदी का सामना किया। अब वैसी ही स्थिति फिर से दस्तक दे रही है।


पं.मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य, आध्यात्मिक लेखक, कानपुर