फिल्म समीक्षा : सामाजिक पूर्वाग्रहों की कहानी
‘खेजड़ी’ एक संवेदनशील सामाजिक ड्रामा है, जो ग्रामीण भारत में किन्नर पहचान और उससे जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों को बेहद मार्मिकता के साथ सामने लाती है। रोहित द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म 2018 में आई थी और अब 2026 में Stage OTT पर उपलब्ध है। फिल्म व्यक्तिगत त्रासदी के जरिए उस समाज पर सवाल उठाती है, जो अनजानी पहचान और भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय उससे डरता है। कहानी खेजड़ी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक किन्नर बच्ची है। उसके पिता, जो आयुर्वेदिक वैद्य हैं, समाज की क्रूरता से उसे बचाने के लिए उसे घर की चारदीवारी में छिपाकर रखते हैं।
गांव वालों से उसकी पहचान छिपाने के लिए पिता उसके मनहूस होने की अफवाह फैला देते हैं। किताबों और जड़ी-बूटियों के बीच बड़ी होती खेजड़ी बाहरी दुनिया को जानने के लिए उत्सुक रहती है, लेकिन जब उसे सामाजिक सच्चाई का सामना होता है तो उसकी दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत आशीष शर्मा का अभिनय है। उन्होंने पारंपरिक नायक की छवि से अलग हटकर खेजड़ी के किरदार में मासूमियत, पीड़ा और आंतरिक मजबूती को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया है।
उनकी बॉडी लैंग्वेज और आंखों के भाव किरदार के भीतर चल रहे संघर्ष को बखूबी व्यक्त करते हैं। रोहित द्विवेदी का निर्देशन कहानी की संवेदनशीलता को बनाए रखता है। रेगिस्तान का सन्नाटा, बंद घर का वातावरण और प्रकाश-छाया का इस्तेमाल खेजड़ी के अकेलेपन को गहराई देता है। पटकथा बिना उपदेश दिए लैंगिक रूढ़ियों और सामाजिक पाखंड पर सवाल उठाती है। ‘खेजड़ी’ मनोरंजन से आगे बढ़कर पहचान, सम्मान और इंसान के अपने तरीके से जीने के अधिकार की कहानी है। गंभीर और लीक से हटकर सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों के लिए यह एक विचारोत्तेजक फिल्म है।
