बोधकथा : असली धन

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Edited By Anjali Singh
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एक गाँव में हरिदास नाम का एक किसान रहता था। वह मेहनती था, लेकिन हमेशा इस चिंता में डूबा रहता कि उसके पास धन कम है। गाँव का साहूकार धनवान था, इसलिए हरिदास उसे देखकर सोचता, “काश! मेरे पास भी इतना पैसा होता, तो मैं सबसे सुखी व्यक्ति होता।”

एक दिन खेत में हल चलाते समय हरिदास को मिट्टी के भीतर एक पुराना घड़ा मिला। उसने घड़ा खोला तो उसमें सोने के सिक्के थे। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह घड़ा घर ले आया और पत्नी से बोला, “अब हमारे सारे दुख दूर हो गए।”

लेकिन उस रात हरिदास सो नहीं सका। उसे डर सताने लगा कि कहीं कोई सिक्के चुरा न ले। अगले दिन उसने खेत जाना छोड़ दिया और दिन-रात धन की रखवाली करने लगा। कुछ ही दिनों में उसका खेत सूखने लगा। फसल खराब होने लगी और घर में अनाज की कमी हो गई।

एक दिन गाँव का बूढ़ा शिक्षक उसके घर आया। उसने हरिदास को उदास देखकर कारण पूछा। हरिदास ने सारी बात बता दी।

शिक्षक मुस्कुराकर बोला, “जिस धन के कारण तुम्हारी नींद, मेहनत और संतोष चला गया, वह धन तुम्हारे किस काम का?”

हरिदास ने कहा, “लेकिन यह सोना तो मुझे अमीर बना सकता है।”

शिक्षक ने उत्तर दिया, “सोना तभी धन है, जब वह जीवन को बेहतर बनाए। यदि वही भय और चिंता का कारण बन जाए, तो वह बोझ है।”

हरिदास को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने कुछ सिक्के बेचकर खेत के लिए बीज, सिंचाई का साधन और खेती के उपकरण खरीदे। बाकी धन सुरक्षित रख दिया। वह फिर मेहनत से खेती करने लगा।

कुछ महीनों बाद खेत लहलहा उठा। घर में अनाज भर गया और हरिदास के चेहरे पर फिर वही संतोष लौट आया। उसने शिक्षक से कहा, “अब समझ आया कि धन का मूल्य उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग में है।” शिक्षक बोले, “और याद रखो, मेहनत से कमाया संतोष ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है।” कथा की सीख धन तभी सार्थक है, जब वह जीवन में सुख, सुरक्षा और संतोष बढ़ाए। लालच और भय से बचकर धन का सदुपयोग करना ही सच्ची समृद्धि है।

 

 

 

 

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