स्त्री की असली आजादी आखिर क्या है... जिंदगी का फैसला खुद लेने का हक आखिर क्यों जरूरी है?

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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अच्छी बेटी से अच्छी मां तक की भूमिकाओं के बीच कहीं खो न जाए स्त्री की अपनी पहचान; सच्ची स्वतंत्रता सिर्फ अवसर मिलने में नहीं, अपनी इच्छा पहचानकर जीवन चुनने में है।

बचपन से स्त्री को अपने मन से पहले दूसरों का मन पढ़ना सिखाया जाता है-कैसे बैठना है, कितना बोलना है, कब लौटना है, क्या पहनना है, परिवार कैसे संभालना है और कौन-सा सपना ‘व्यावहारिक’ है। उसकी इच्छाओं से ज्यादा उसकी जिम्मेदारियां तय की जाती हैं। ऐसे में जब उससे पूछा जाता है- ‘तुम क्या चाहती हो?’ तो वह अपनी चाहत का जवाब कैसे दे? उससे कम ही पूछा गया कि उसे सच में क्या अच्छा लगता है। स्त्री की स्वतंत्रता का असली सवाल यहीं से शुरू होता है-क्या उसे अपनी इच्छा पहचानने और उसे चुनने का अवसर मिला है?

भूमिकाओं में बंधा बचपन

लड़की को बचपन से ही उसके भविष्य को रिश्तों और जिम्मेदारियों से बांध दिया जाता है-अच्छी बेटी, बहन, पत्नी, बहू और मां। लड़के से पूछा जाता है- ‘क्या बनोगे?’, लड़की से-‘कैसे निभाओगी?’ उसे रास्ता चुनने से पहले भूमिकाएं निभाना सिखाया जाता है। धीरे-धीरे उसकी पहचान इच्छाओं से नहीं, जिम्मेदारियों से होने लगती है। समस्या अवसरों की कमी से ज्यादा, अपनी इच्छा पहचानकर भविष्य चुनने के अभ्यास की है।

‘अच्छी लड़की’ का अदृश्य पहरा

‘अच्छी लड़की’ की छवि धीरे-धीरे भीतर नियम बन जाती है-कम सवाल करो, किसी को असुविधा न हो, रिश्ते बचाओ और खुद से पहले दूसरों को रखो। यही सीख हर फैसले पर पहरा बैठा देती है। नौकरी बदलो तो घर, अकेले निकलो तो समाज, विवाह हो तो परिवार और अपनी इच्छा हो तो अपराधबोध सामने आता है। फिर अपनी चाहत भी अपनी नहीं लगती, उसे पूरा करने से पहले अनुमति जरूरी लगती है। यह कंडीशनिंग अक्सर माताओं और परिवार की महिलाओं के माध्यम से भी आगे बढ़ती है, जो खुद इसी व्यवस्था में पली-बढ़ी होती हैं। इसे तोड़ने के लिए सिर्फ पुरुषों को नहीं, पूरे परिवार को जागरूक करना होगा।

सबके बीच, खुद से दूर

घर की स्त्री सबकी जरूरत जानती है-किसे क्या चाहिए, किसका काम कब है। लेकिन पूछो- ‘तुम्हें क्या चाहिए?’ तो जवाब मिलता है- ‘कुछ नहीं।’ यह हमेशा संतोष नहीं’ वर्षों तक इच्छाएं टालते रहने का असर भी हो सकता है। दूसरों की प्राथमिकताएं संभालते-संभालते वह अपनी चाहत भूल जाती है। इसलिए स्त्री-मुक्ति केवल अधिकार नहीं, अपनी इच्छा पहचानने की जगह भी है। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है-अपराधबोध, थकान, अपनी पहचान का धुंधला होना और कभी-कभी डिप्रेशन या बर्नआउट। अपनी चाहत पहचानना सिर्फ आजादी नहीं, स्वास्थ्य का भी सवाल है।

अपनी ‘हां’ का अधिकार

स्त्री को ‘न’ कहना सिखाना जरूरी था, लेकिन स्वतंत्रता वहीं पूरी नहीं होती। उसे यह भी तय करना है कि उसकी ‘हां’ किसके लिए है-करियर या आर्थिक स्वतंत्रता, विवाह या अकेलापन, मातृत्व या अपने समय का अधिकार, बड़ी सफलता या सुकून भरा जीवन। हर स्त्री की चाहत अलग है। स्वतंत्रता का अर्थ एक जैसा जीवन नहीं, अपने जीवन का अर्थ खुद चुनना है।

चाहत का कोई पैमाना नहीं

स्त्री की स्वतंत्रता को बड़ी उपलब्धियों से जोड़ना भी एक दबाव है-बड़ी नौकरी, व्यवसाय, विदेश या पुरस्कार। जबकि उसकी चाहत कभी बस बिना जिम्मेदारी सोना, अकेले चाय पीना, किताब पढ़ना, दोस्तों से मिलना, नौकरी करना या छोड़ना या कुछ देर किसी को जवाब न देना हो सकती है। इच्छा छोटी-बड़ी नहीं होती। पुरुष की पसंद सहज स्वीकार होती है, स्त्री से आज भी पूछा जाता है- ‘क्यों?’ उसकी हर चाहत को उपयोगी साबित करने की जरूरत क्यों हो?

बेटी से पेशा नहीं, जिंदगी पूछिए

बेटी से सिर्फ यह न पूछें- ‘बड़ी होकर क्या बनोगी?’ कभी यह भी पूछें- ‘कैसी जिंदगी जीना चाहोगी?’ उसके जवाब को तुरंत सलाह या ‘व्यावहारिक’ सोच में न बांधें। आज डॉक्टर, कल कलाकार, आज महानगर, कल छोटा शहर-उसकी पसंद बदल सकती है। अपनी इच्छा बदलने का अधिकार भी स्वतंत्रता है। बेटी को सिर्फ फैसला लेने नहीं, उसे बदलने की आजादी भी चाहिए और जब वह जवाब बदले, तो उसे ‘अस्थिर’ न कहें-बदलाव का अधिकार भी आजादी का हिस्सा है।

आजादी मिली, आवाज कहां मिली

शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कानूनी अधिकारों ने स्त्री के लिए दरवाजे खोले हैं, लेकिन भीतर का एक दरवाजा अब भी बंद है। हर इच्छा से पहले सवाल उठता है- ‘लोग क्या कहेंगे?’ उसे गलत चुनने, थकने, रुकने, मन बदलने और फिर शुरू करने की उतनी ही आजादी चाहिए, जितनी सफल होने की। सच्ची स्वतंत्रता बाहर निकलने के साथ अपनी आवाज तक पहुंचने की भी है। स्त्री को स्वतंत्र करना और उसे स्वतंत्रता का अर्थ खुद तय करने देना अलग बातें हैं। शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जरूरी है, पर अकेले पर्याप्त नहीं। जब तक ‘लोग क्या कहेंगे’ और परिवार की इज्जत का डर रहेगा, भीतर की आवाज दबी रहेगी।

‘मुझे नहीं पता’ के पीछे छूटी चाहतें

अब तक सवाल रहा-औरत को क्या करने नहीं दिया गया? अगला सवाल होना चाहिए-उसने क्या चाहना छोड़ दिया? जब उससे पूछा जाए, ‘तुम क्या चाहती हो?’ और जवाब मिले- ‘मुझे नहीं पता’, तो इसे कमजोरी न समझें। जिसने उम्रभर दूसरों की इच्छाएं पढ़ी हों, उसे अपनी चाहत पहचानने में समय लगेगा। उसे जवाब के लिए दबाने के बजाय कहना होगा- ‘जल्दी मत करो, पहले अपने भीतर झांको।’ स्त्री की मुक्ति केवल पुरुषों जैसे अवसर पाने में नहीं, अपने जीवन का चुनाव खुद करने में है। मां बनना हो या न बनना, करियर चुनना हो या शांत जीवन, विवाह करना हो या अकेले रहना। हर चुनाव को बराबर सम्मान मिलना चाहिए। सच्ची स्वतंत्रता तब होगी, जब उसकी इच्छा को अनुमति और चुनाव को सफाई की जरूरत न पड़े। तब ‘तुम क्या चाहती हो?’ सिर्फ सवाल नहीं, एक खुला दरवाजा होगा-जहां कोई तय भूमिका नहीं, सिर्फ एक स्त्री होगी, अपनी आवाज, अपनी पहचान और अपनी इच्छा के साथ।

- कृति आरके जैन, लेखिका

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