कटान में सिर्फ खेत नहीं, बर्बाद हो रही किसानों की जिंदगी; राप्ती में समा रही उपजाऊ जमीन

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Edited By Muskan Dixit
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पुश्तैनी जमीन आंखों के सामने निगल रही नदी, वीरपुर लौकिहा में लगातार कटान से किसानों की बढ़ी चिंता

जमुनहा (श्रावस्ती), अमृत विचार। राप्ती नदी का कटान किसानों की वर्षों की मेहनत और उनकी पुश्तैनी जमीन पर भारी पड़ रहा है। जमुनहा तहसील क्षेत्र के वीरपुर लौकिहा गांव में लगातार हो रहे कटान के चलते अब तक कई बीघा उपजाऊ कृषि भूमि राप्ती की धारा में समा चुकी है। कटान का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे किसानों को अपनी जमीन और भविष्य की चिंता सताने लगी है।

आंखों के सामने नदी में समा रही पुश्तैनी जमीन

कटान की चपेट में आए किसानों का दर्द उस समय सामने आया, जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने पुश्तैनी जमीन को नदी की धारा में समाते देखा। किसानों का कहना है कि जिन खेतों को उन्होंने बचपन से देखा और जिनमें खेती करके परिवार का भरण-पोषण किया, अब वही जमीन धीरे-धीरे राप्ती की तेज धारा में बहती जा रही है।

किसानों के मुताबिक, जमीन उनके लिए सिर्फ खेती का साधन नहीं है। इससे उनकी आजीविका, वर्षों की मेहनत और बच्चों के भविष्य की उम्मीदें जुड़ी हैं। एक-एक गट्ठा जमीन उनके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन नदी का कटान लगातार उनकी मेहनत को निगलता जा रहा है।

सैकड़ों बीघा जमीन नदी में समाने का दावा

ग्रामीणों का कहना है कि अब तक सैकड़ों बीघा कृषि भूमि राप्ती नदी में समा चुकी है। इसके बावजूद प्रभावित किसानों को फसल और जमीन के नुकसान के अनुपात में पर्याप्त राहत नहीं मिल सकी है।

किसानों को आशंका है कि यदि समय रहते कटान रोकने के ठोस इंतजाम नहीं किए गए तो आने वाले दिनों में बड़ी मात्रा में और कृषि भूमि नदी की धारा में समा सकती है। इससे किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी गहरा सकता है।

प्रशासन से स्थायी इंतजाम और मुआवजे की मांग

प्रभावित किसानों ने प्रशासन से कटान प्रभावित क्षेत्र का तत्काल स्थलीय निरीक्षण कराने और नुकसान का आकलन कराने की मांग की है। साथ ही नदी के कटान को रोकने के लिए प्रभावी और स्थायी इंतजाम किए जाने की मांग उठाई है।

किसानों का कहना है कि प्रभावित परिवारों को नियमानुसार उचित मुआवजा और राहत भी उपलब्ध कराई जाए, ताकि जमीन और फसल के नुकसान से उन्हें कुछ राहत मिल सके।

आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता

ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर राप्ती नदी इसी तरह लगातार जमीन निगलती रही तो आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती और गुजर-बसर का सहारा कैसे बचेगा। किसानों के लिए यह सिर्फ जमीन के कटान का मामला नहीं, बल्कि आजीविका और भविष्य के अस्तित्व से जुड़ा संकट बनता जा रहा है।

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