बरेली: बैंकों की चौखट पर दम तोड़ रहे स्वरोजगार के सपने

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महिपाल गंगवार, बरेली। केंद्र व प्रदेश सरकार की ओर से स्वरोजगार के लिए संचालित की जा रहीं योजनाओं का जिले में बुरा हाल है। उद्योग केंद्र से संबंधित योजनाओं के आवेदन स्वीकृत कर बैंक शाखाओं को भेज रहे हैं, लेकिन कमीशनखोरी के चक्कर में बैंक कर्मियों के स्तर से फाइलें पास नहीं की जा रही …

महिपाल गंगवार, बरेली। केंद्र व प्रदेश सरकार की ओर से स्वरोजगार के लिए संचालित की जा रहीं योजनाओं का जिले में बुरा हाल है। उद्योग केंद्र से संबंधित योजनाओं के आवेदन स्वीकृत कर बैंक शाखाओं को भेज रहे हैं, लेकिन कमीशनखोरी के चक्कर में बैंक कर्मियों के स्तर से फाइलें पास नहीं की जा रही हैं। कोई एक महीने से तो कोई पांच से छह महीने से बैंक और उद्योग विभाग के बीच घनचक्कर बना हुआ है। इतना ही नहीं एक साल से दौड़ लगा रहे आवेदकों की जब बैंक से सारी उम्मीदें खत्म हो गईं तो उन्होंने थक हारकर योजना का लाभ लेने से ही इनकार कर दिया है।

बेरोजगारों को लोन उपलब्ध कराकर सरकार स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही है। इसी मकसद से मुद्रा योजना, एक जिला एक उत्पाद योजना (ओडीओपी), मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना (एमवाईएसवाई) और प्रधानमंत्री सृजन रोजगार योजना (पीएमईजीपी) के अंतर्गत लोन दिलाकर युवाओं को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाने बल्कि दूसरों को रोजगार देने की कोशिश है। मगर, स्थिति यह है कि आवेदन करने के बाद भी इनमें अधिकांश को लोन नहीं मिल सका है। यह आलम तब है जब लोन बांटने के मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, बड़ौदा उप्र ग्रामीण बैंक, स्टेट बैंक समेत जिले के छह बड़े बैंक फिसड्डी साबित हो चुके हैं।

विभागीय आंकड़ों की बात करें तो ओडीओपी योजना के तहत 364 आवेदन उद्योग केंद्र की तरफ से बैंक भेजे गए। इनमें नाममात्र को ही लोन मिल सका। इसी तरह एमवाईएसवाई में 204 आवेदनों में मात्र 17 को बैंक ने पात्र मानकर लोन दिया। यही हाल प्रधानमंत्री सृजन रोजगार योजना का है। 284 फाइलों में मात्र 21 को लोन बांटा गया है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि जिले के नोडल अधिकारी नवनीत सहगल की फटकार के बाद बैंकों का रवैया सुधरता नहीं दिख रहा है।

15 प्रतिशत तक है अनुदान की सुविधा

प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम योजना पूर्णतया भारत सरकार द्वारा प्रायोजित एक महत्वपूर्ण स्वरोजगार की योजना है। इसका संचालन प्रदेश में तीन एजेंसियों क्रमश: जिला उद्योग केंद्र, खादी और ग्रामोद्योग आयोग एवं उत्तर प्रदेश खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा किया जाता है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग नोडल एजेंसी के रूप में नामित है।

योजना के अंतर्गत अधिकतम ₹25 लाख रुपये तक का लोन मिलता है। लाभार्थियों का चयन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय दल के माध्यम से होता है। वहीं तकनीकी आर्थिक व्यवहारिकता के अनुसार बैंकों द्वारा परियोजना की मंजूरी प्रदान की जाती है। सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को परियोजना लागत का 10 प्रतिशत एवं आरक्षित श्रेणी के लाभार्थियों के लिए परियोजना लागत का 5 प्रतिशत का अंशदान लगाना होता है। इसमें 15 प्रतिशत अनुदान की सुविधा भी है।

केस-1

प्रवीन बोले- दस लाख के लोन में बताए सौ बहाने
प्रवीन फर्नीचर बनाने का काम करते हैं। सहयोगी के तौर पर उनके साथ चार कारीगर और हैं। इसके विस्तार के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सृजन रोजगार योजना के तहत 10 लाख का लोन लेने को आवेदन किया। उनके मुताबिक उद्योग केंद्र में साक्षात्कार के बाद फाइल बैंक शाखा भेज दी गई। संबंधित शाखा पहुंचे तो कहा गया कि पोर्टल पर फाइल पड़ी है। एक सप्ताह बाद बुलाया गया। इसके बाद से करीब छह महीने का वक्त बीच चुका है। बैंक से करीब एक महीने पहले तमाम तरीके की खामियां गिनाकर लोन देने से इनकार कर दिया है। इसके बाद किसी योजना के लिए आवेदन ही नहीं किया।

केस-2

प्रीतम ने कहा- सात माह काटे चक्कर लेकिन लोन नहीं मिला
प्रीतम सिंह का बेकरी उद्योग है। 30 से 40 लाख रुपये का टर्नओवर भी है। उद्योग के विस्तार के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सृजन रोजगार योजना के तहत 10 लाख का लोन लेने को आवेदन किया। उद्योग विभाग की तरफ से गठित कमेटी ने साक्षात्कार लिया। संतुष्ट होने पर फाइल को स्वीकृति देते हुए संबंधित बैंक शाखा को भेज दी। तकरीबन सात महीने का समय बीतने के बाद भी उनको संबंधित शाखा से लोन नहीं मिला। इसके लिए उद्योग विभाग से लेकर बैंक अफसरों के पास तमाम चक्कर काटे। मगर, भागदौड़ के बाद जब नतीजा शून्य रहा तो थककर पांव पीछे खींच लिए।

उद्योग केंद्र से उन लाभार्थियों की फाइल बैंकों को भेजी जाती है जो उद्यम लगाने में सक्षम हो। बैंक से महीनों तक फाइलें लंबित पड़ी रहती हैं। नोडल अधिकारी के अलावा कमिशनर, जिलाधिकारी की बैठक में भी इस मुद्दे का उठाया जा चुका है। लेकिन बेराजगार अब भी परेशान है। वह हमारे कार्यालय पहुंचते हैं तो उन्हें भी यही समझाया जाता है कि बैंक स्तर पर फाइल लंबित है।– आरआर गोयल, उपायुक्त उद्योग

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