बरेली: संघर्ष के 21 साल, जगी 270 करोड़ मिलने की आस
अमृत विचार, बरेली। रबर फैक्ट्री (सिंथेटिक एंड केमिकल्स) के कर्मचारी अपना हक लेने के लिए 21 साल से संघर्ष कर रहे हैं। इसमें अब जाकर उम्मीद की किरण नजर आई है। करीब 270 करोड़ रुपये लेने के लिए कर्मचारियों की ओर से भी बाम्बे हाईकोर्ट में याचिका डाली गई है। उसमें पैरवी कराने के लिए …
अमृत विचार, बरेली। रबर फैक्ट्री (सिंथेटिक एंड केमिकल्स) के कर्मचारी अपना हक लेने के लिए 21 साल से संघर्ष कर रहे हैं। इसमें अब जाकर उम्मीद की किरण नजर आई है। करीब 270 करोड़ रुपये लेने के लिए कर्मचारियों की ओर से भी बाम्बे हाईकोर्ट में याचिका डाली गई है। उसमें पैरवी कराने के लिए कर्मचारियों ने अपने खर्चे पर अधिवक्ता भी नियुक्त किया है।
बाम्बे हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्मचारियों की 270 करोड़ रुपये की देनदारी के संबंध में अंतिम सेलरी की सत्यापित सूची मांगी है। उसमें कर्मचारियों की फैक्ट्री में ज्वाइनिंग की तारीख, जन्मतिथि के बारे में भी जानकारी तलब की है। कर्मचारियों को श्रमायुक्त के यहां से 4 नवंबर, 1999 में अंतिम सेलरी जारी की गई।
उस सेलरी की सत्यापित सूची लेने के लिए कर्मचारियों की ओर से पैरवी कर रहे कर्मचारी अशोक मिश्रा ने श्रमायुक्त से बात की है। सत्यापित सूची के साथ कर्मचारियों के आधार कार्ड की फोटोकॉपी बाम्बे हाईकोर्ट में जमा की जाएगी। अशोक मिश्रा ने बताया कि शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के कार्यालय पर ही श्रमायुक्त से बात हुई थी।
उन्होंने बताया कि 270 करोड़ रुपये की देनदारी में कर्मचारियों की सेलरी से 12 प्रतिशत कटे पूंजीपति अंश शामिल नहीं हैं। इसे मिलाने पर रकम और बढ़ जाएगी। इस संबंध में पीएफ कमिश्नर से भी बात की है। सीधे तौर पर न सेलरी की सत्यापित सूची और न पीएफ की सूची मिलेगी।
अधिकारियों ने उनके मिलने का रास्ता बता दिया है। आरटीआई के जरिये सत्यापित सूची मांगेंगे। उन्होंने बताया कि कर्मचारियों का हक लेकर रहेंगे। बाम्बे हाईकोर्ट के सेलरी की सत्यापित सूची तलब करने से बकाया मिलने की आस जगी है।
यह है रबर फैक्ट्री का इतिहास
बरेली। रबर फैक्ट्री के लिए 1960 के दशक में मुंबई के सेठ किलाचंद को फतेहगंज पश्चिमी में 1382.23 एकड़ जमीन उपलब्ध करायी थी। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 3.40 लाख रुपये लेकर जमीन लीज पर दी थी। उसमें यह शर्त शामिल की गई कि जब फैक्ट्री बंद होगी तब सरकार जमीन वापस ले लेगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। यह फैक्ट्री 15 जुलाई 1999 को बंद हुई थी। बताते हैं कि फैक्ट्री चालू अवस्था में थी तब फैक्ट्री प्रबंधन ने 147 करोड़ रुपये का 14 बैंकों से ऋ ण लिया था। वहीं, लोन अब बढ़कर तीन गुना हो गया। बैंकों और कर्मचारियों का मिलाकर 500 करोड़ रुपये की देनदारी है।
जमीन बचाने की तैयारी में जुट़ा प्रशासन
रबर फैक्ट्री की 1382 एकड़ भूमि को बचाने के लिए प्रशासन जुटा है। फैक्ट्री की जमीन की पैमाइश कराने के बाद जिलाधिकारी नितीश कुमार ने शासन को रिपोर्ट भेज दी है। उन्होंने पुनर्प्रवेश किए जाने के लिए फैक्ट्री के देयों के संबंध में संबंधित सभी स्टेक होल्डर्स से समझौते के आधार पर न्यूनतम धनराशि/पैकेज निर्धारण करने की बात रखी है। फैक्ट्री की जमीन की बाम्बे हाईकोर्ट में पैरवी कराने के लिए अधिवक्ता भी शासन से नामित किये जा चुके हैं।
