कभी राजीव गांधी से सीखे थे शांति ने राजनीति के गुर और आज…
भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। राजनीति कैरियर शीर्ष पर होने के बावजूद जब कोई इससे अचानक किनारा कर ले तो बात गले नहीं उतरती। ऐसे ही नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले धारी तहसील की महिला हैं शांति बिष्ट जिन्होंने अचानक राजनीति जीवन से सन्यास लिया और अब एक गृहणी के रूप में नाती पोतों के साथ …
भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। राजनीति कैरियर शीर्ष पर होने के बावजूद जब कोई इससे अचानक किनारा कर ले तो बात गले नहीं उतरती। ऐसे ही नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले धारी तहसील की महिला हैं शांति बिष्ट जिन्होंने अचानक राजनीति जीवन से सन्यास लिया और अब एक गृहणी के रूप में नाती पोतों के साथ खेती-बागवानी में अपना सारा समय व्यतीत कर रही हैं।
33% महिला आरक्षण की माँग करने वाली पहली महिला, अपने ही सरकार के खिलाफ 15 दिनों तक आमरण अनशन करने वाली नेत्री,अपने क्षेत्र के विद्यालय मे हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली अकेली छात्रा, अपने क्षेत्र की महिलाओं को स्वयं सहायता समूह में कार्य करने की आदत डलवाने वाली एक सोच ,यहां तक की ब्लाक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, कांग्रेस की प्रदेश महामंत्री , बेसिक शिक्षा समिति की सदस्य, कोऑपरेटिव बैंक की निदेशक और उत्तराखंड महिला हॉकी एसोसिएशन की उपाध्यक्षा रह चुकी शान्ति अब पहाड़ की शांत वादियों में जीवन का आनंद ले रही हैं।
राजनीतिक जीवन से दूरी बनाने पर केवल इतना ही कहती हैं कि राजनीति से बहुत कुछ सीखा पर राजनीति ही जब कार्यों पर खलल पैदा करे ,द्वेष ,ईर्ष्या छल कपट पर अपने ही करीबी उतर आएं तो उस राजनीतिक दुश्मनी से अच्छा है की किनारा ही कर लिया जाये।
जी हाँ, अब शायद आप यह सोच रहे होंगे की शान्ति बिष्ट हैं कौन? थोडा और स्पष्ट कर देते हैं, धारी ब्लाक के मझेडा गांव निवासी शान्ति बिष्ट आज राजनिति से कोसों दूर हैं और अपने पति बच्चों और नाती पोतों के साथ समय व्यतीत कर रही हैं, पति हरेन्द्र सिंह अभियांत्रिक अनुभाग मे उपनिदेशक पद पर से सेवानिर्वत हुए और अब एक रिसोर्ट संचालक हैं , शांति बिष्ट बताती हैं की 1970 मे शादी हुई और अलग करने की चाह और पढ़ाई के प्रति रूचि को देखते हुए पति ने हमेशा साथ दिया और आगे बढ़ने की अलख जगाई , 1974 मे जिला परिषद की सदस्य चुनीं गयी और बेसिक शिक्षा समिति की सदस्य भी बस यहीं से सामाजिक जीवन का दायरा बड़ा।

इधर शिक्षा का विस्तार भी धीरे-धीरे बड़ रहा था , शान्ति बताती हैं की जब वह दसवीं की छात्रा थी तो कक्षा में अकेली लड़की थीं जबकि कक्षा में 28 लड़के थे पर कभी मनोबल नहीं टृूटा और परीक्षा उत्तीर्ण की, बीए,एमए फिर लखनऊ से एलएलबी की, कॉलेज जीवनकाल में एनसीसी का प्रमाण पत्र भी हासिल किया , फिलहाल शायद समय को कुछ और मंजूर था और सन 1988 में धारी ब्लाक प्रमुख पद पर उनका चुनाव हुआ बस यहीं से मानो हौसलों को अचानक बल मिला और महिलाओं के विकास के साथ क्षेत्र में तमाम विकास कार्य किए।
शान्ति बताती हैं जब वे ब्लाक प्रमुख पद पर थी तब तत्कालीन केन्द्रीय कांग्रेस सरकार व ख़ास राजीव गांधी ने दिल्ली सम्मलेन मे शामिल होने का न्योता भेजा और पहली बार वहां उन्होंने जनता को सम्बोधित किया जिसका प्रसारण राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर हुआ और पूरे भारत वर्ष ने कामयाबी की तारीफ की यही नहीं महिलाओं के विकास को लेकर 33% आरक्षण की बात मंच से कही जिस पर तुरंत फल मिला और संतुस्ती कर दी गयी जो आज बड़ कर 50% कर दिया गया है, शान्ति बताती हैं की वर्ष 2003 में ब्लाक प्रमुख रहते हुए वह पहली महिला थीं जिन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देहरादून में 15 दिनों तक आमरण अनशन किया। इस अनशन की प्रमुख मांग क्षेत्र पंचायत निधि प्रतिवर्ष 25 लाख की करने की मांग मनवायी थी।
इतिहास मे अगर जाएं तो शान्ति का कार्यकाल कुछ इस तरह रहा सन्1974 मे पहली बार यूपी शासन काल मे जिला पंचायत सदस्य चुनी गयी, 1988-1996 तक ब्लाक प्रमुख धारी रहीं , 1997-2002 तक जिला पंचायत सदस्य, 2002- 2007 तक ब्लाक प्रमुख धारी रहीं ,इसके साथ ही कोऑपरेटिव बैंक की निदेशक , उत्तराखंड मानवाधिकार अध्यक्ष ,कांग्रेस प्रदेश महामंत्री इतना लंबा कार्यकाल और अच्छा राजनीतिक अनुभव के बाद अचानक इससे मोह भंग होने के बाबत सवाल पूछने पर शान्ति कहती हैं की आज ओछी राजनिति हावी है, अपने ही लोग जिन्हें हम अपना समझते हैं वह विभीषण का कार्य करते हैं यही नहीं राजनिति में आपको दूसरी पार्टी के लोगों से भी सहयोग और सामंजस्य बिठाना होता है पर जब उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाए, सोच के विपरीत कार्य को जबरन सर पर थोपा जाए , पार्टी के लोग स्वयं के स्वार्थ सिद्ध हेतु प्रयास करते हैं और बेवजह दबाव डलवाते हैं जो उन्हें पसंद नहीं इन्ही सब चीजों से अजीज आ कर उनका मोह भंग हो गया और राजनिति से दूरी बना ली।

आपको बताते चलें की शान्ति बिष्ट व उनके पति हरेन्द्र बिष्ट को उत्तराखंड के नींव के पत्थर सम्मान से भी नवाजा चुका है , फिलहाल दोनों पति-पत्नी आज खुश हैं और राजनिति से दुरी बना अपने आवास पर तमाम प्रकार के वृक्ष,सब्जी,फूल,व दूध उत्पादन का कार्य करते हैं और अपने रिसोर्ट पर पहुंचने वाले पर्यटकों को लोक संस्कृति से जुड़े वाद्य यंत्रों, रहन सहन,भोजन से जुडी चीजों को परोसते नजर आते हैं , आज दंपती ने कई बेरोजगार युवाओं और महिलाओं को रोजगार तो दिया ही है साथ ही महिलाओं के तमाम संगठनों मे जान फूंकने का कार्य कर रही शान्ति अब समाज सेवा को ही परम धर्म मानती हैं और महिलाओं से अपील करती हैं की अपनी बात को समाज मे रखनें मे हिचकिचाहट न रखें और महिला जनप्रतिनिधि केवल रबर स्टाम्प बनकर न रहें।
