बरेली: ‘क’ से कबूतर, ‘ख’ से खरगोश वाली किताबों में भी वसूली

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बरेली, अमृत विचार। स्कूलों में बच्चों को क से कबूतर, ख से खरगोश पढ़ाने में ही अभिभावकों की जेब खाली हो रही है। शहर के नामचीन स्कूलों में प्रीएनसी, एनसी की किताबों की कीमत 1500 से 2500 तक वसूली जा रही हैं। जबकि इन बच्चों को केवल वर्णमाला का ही ज्ञान कराया जाना चाहिए लेकिन …

बरेली, अमृत विचार। स्कूलों में बच्चों को क से कबूतर, ख से खरगोश पढ़ाने में ही अभिभावकों की जेब खाली हो रही है। शहर के नामचीन स्कूलों में प्रीएनसी, एनसी की किताबों की कीमत 1500 से 2500 तक वसूली जा रही हैं। जबकि इन बच्चों को केवल वर्णमाला का ही ज्ञान कराया जाना चाहिए लेकिन स्कूलों में जब बात कमीशन की आती है तो धड़ल्ले से निजी प्रकाशनों की किताबों को कोर्स में लगा दिया जाता है ताकि स्कूल अपना मोटा कमीशन ले सकें।

सीबीएसई और आईसीएसई स्कूलों में तीन वर्ष बाद ही सिलेबस बदलने का प्रावधान है लेकिन स्कूल कमीशन पाने के लिए हर साल कोर्स में बदलाव कर देते हैं जिसकी मार अभिभावकों को झेलनी पड़ती है। शहर के निजी स्कूलों में प्रीएनसी, एनसी में कम से कम सात से आठ किताबों को लगाया जा रहा है जिनकी कीमत कम से कम 1000 रुपये है। साथ ही कॉपियों की कीमत इससे अलग है। जितनी किताबें करीब उतनी ही कॉपियां लगाई जाती हैं।

हद तो इस बात की है कि इन सब के अतिरिक्त अभिभावकों पर स्टेशनरी लेने का भी दबाव बनाया जाता है जिससे यह कीमत और बढ़ जाती है। ऐसा किसी एक स्कूल में नहीं बल्कि तमाम नामचीन स्कूलों में हो रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल यह सब कमीशन पाने के लिए करते है। लेकिन अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता कि स्कूल प्रीएनसी और एनसी में इतनी किताबें क्यों लगा रहे है।

“स्कूलों में प्रीएनसी और एनसी की कक्षाओं का कोई प्रावधान ही नहीं है लेकिन फिर भी स्कूल यह कक्षाएं लगाते हैं। इसके बाद वह पूरा कोर्स लगाकर अभिभावकों की जेबें काट रहे हैं। जबकि इन बच्चों को केवल वर्णमाला का ही ज्ञान कराना चाहिए।” -खालिद जीलानी, कन्वीनर पैरेंट्स फोरम

“स्कूल एनसी-प्रीएनसी में केवल कमीशन पाने के लिए किताबों को लगा रहे हैं जो अभिभावक कोर्स नहीं लेता उसे जबरदस्ती कोर्स लेने को मजबूर किया जा रहा है। ऑनलाइन कक्षाओं में सात-आठ किताबों का क्या मतलब बनता है।” -अंकुर सक्सेना, अध्यक्ष, अभिभावक संघ

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