बरेली: कोरोना ने छीनी जिंदगी, लॉकडाउन ने काम, पत्नी की चिता को लकड़ी खरीदने के भी पैसे नहीं…
बरेली, अमृत विचार। कोरोना का महंगा इलाज कराने के बाद एक मजदूर की जेब में इतने पैसे भी नहीं बचे थी कि वह अपनी पत्नी की चिता के लिए लकड़ी भी खरीद सके। शनिवार को पत्नी का शव लेकर जब वह संजयनगर श्मशान घाट पहुंचा तो वहां अंतिम संस्कार के लिए सामग्री खरीदने को एक-दूसरे …
बरेली, अमृत विचार। कोरोना का महंगा इलाज कराने के बाद एक मजदूर की जेब में इतने पैसे भी नहीं बचे थी कि वह अपनी पत्नी की चिता के लिए लकड़ी भी खरीद सके। शनिवार को पत्नी का शव लेकर जब वह संजयनगर श्मशान घाट पहुंचा तो वहां अंतिम संस्कार के लिए सामग्री खरीदने को एक-दूसरे का मुंह ताकने लगा। बाद में उसने अपना दर्द श्मशान के कर्मचारियों को बताया तो उससे कोई खर्च लिए बगैर ही लकड़ी दे दी गई। श्मशान वालों का कहना है कि मजदूर की मृतक पत्नी के अस्पताल के कागज पर मृत्यु का कारण कोरोना नहीं लिखा था। फिर भी मजदूर की हालत देखकर उन्हें मुफ्त में लकड़ी दे दी गई।
आर्थिक तौर से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल में कोरोना का बेहद खर्चीला इलाज करा पाना बहुत कठिन है। बाद में उनकी हालत यह हो जाती है कि अगर संक्रमण का शिकार हुए परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उसकी अंत्येष्टि के लिए तक पैसे नहीं बचते हैं। शनिवार को संजयनगर में रहने वाले एक गरीब मजदूर की पत्नी की कोरोना से मौत हो गई थी।
मजदूर किसी तरह से पत्नी का शव संजयनगर तो ले आया लेकिन उसके पास इतनी भी रकम नहीं थी, वह वहां चिता की लकड़ी खरीद सके। बताते हैं कि वह कुछ देर इधर-उधर घूमता हुआ परेशान रहा। बाद में हिम्मत जुटाकर श्मशान के कर्मचारियों को अपनी व्यथा बताई। मजदूर का कहना था कि लॉकडाउन में काफी समय से काम नहीं मिला है। थोड़े-बहुत जो पैसे थे भी, वे इलाज में लग गए हैं। अब वह अंत्येष्टि के लिए रकम कहां से लाए?
इसके बाद श्मशान वालों ने प्रबंधन से बात करने के बाद मजदूर को पैसा लिए बगैर लकड़ी दे दी। श्मशान के कर्मचारियों का कहना था कि नगर निगम केवल उन्हीं शवों के लिए आर्थिक मदद दे रहा है, जिनकी मृत्यु का कागज अस्पताल ने स्पष्ट रूप से कोरोना लिखा हो। जबकि कई मौतें टाइफाइड, सांस की बीमारी आदि से हो रही हैं। उन्हें कोविड तो माना जा रहा है लेकिन डॉक्टर ऐसे मामलों में कोरोना नहीं लिखा जा रहा है। मजदूर की पत्नी की मौत का कारण भी स्पष्ट तौर से कोरोना नहीं लिखा था। इसके बावजूद श्मशान प्रबंधन ने मजदूर की हालत देखकर उसकी पत्नी के अंतिम संस्कार की मुफ्त व्यवस्था कर दी है।
