मिलावटखोरों को सजा दिला पाने में नाकाम है एफएसएसएआई
संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। मिलावटखोरों पर कार्रवाई में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की विफलता के परिणामस्वरूप खाद्य वस्तुओं में मिलावट की समस्या दिनोदिन गंभीर होती जा रही है। प्राधिकरण खाद्य वस्तुओं के नमूने तो खूब भरता है। लेकिन सजा दिलाने में उसका रिकार्ड बेहद खराब है। साल में मिलावट के 27-28 …
संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। मिलावटखोरों पर कार्रवाई में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की विफलता के परिणामस्वरूप खाद्य वस्तुओं में मिलावट की समस्या दिनोदिन गंभीर होती जा रही है। प्राधिकरण खाद्य वस्तुओं के नमूने तो खूब भरता है। लेकिन सजा दिलाने में उसका रिकार्ड बेहद खराब है। साल में मिलावट के 27-28 हजार मामलों में वो सिर्फ 8-9 सौ मामलों में ही सजा दिला पाता है। यूं तो खाद्य वस्तुओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए देश में पूरा तंत्र है। जिसके अंतर्गत 2006 में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम लाने के साथ उसके कार्यान्वयन की खातिर 2008 में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) का गठन भी कर दिया गया था।
एफएसएसएआइ के कामकाज की निगरानी के लिए राज्यों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों के प्रतिनिधत्व वाली केंद्रीय सलाहकार समिति (सीएसी) का गठन भी कर दिया गया था। जिसका काम हर तीन महीने में बैठक कर मिलावट के मामलों की समीक्षा करना है। वर्ष 2010-11 से लेकर 2019-20 की अवधि में समिति की 27 बैठकें हुई हैं। समिति के निर्णयों के आधार पर राज्यों के स्तर पर खाद्य सुरक्षा अधिकारी समय-समय पर दुकानों और फैक्ट्रियों में जाकर खाद्य उत्पादों के नमूने लेते हैं और उन्हें जांच के लिए प्रयोगशालाओं में भेजते हैं।
आम तौर पर इन जांचों में एक चौथाई मामलों में खाद्य पदार्थ में मिलावट की पुष्टि होती है। इन पुष्ट हुए 90 फीसद मामलों में मिलावतकर्ता के खिलाफ दीवानी या आपराधिक मुकदमे दायर किए जाते हैं। परंतु खाद्य विभाग द्वारा असली गुनहगार को न पकड़े जाने और मामलों की ठीक से पैरवी न किए जाने के कारण केवल 3.5 फीसद मामलों में ही दोष सिद्ध होता है और दोषियों को सजा हो पाती है। यही वजह है कि खाद्य नमूनों की जांच बढ़ने के बावजूद मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं और खाद्य वस्तुओं में मिलावट रुकने का नाम नहीं ले रही।
खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक वर्ष 2016-17 में खाद्य वस्तुओं के 78,340 नमूनों की सालाना जांच में 18,325 नमूनों में मिलावट की पुष्टि हुई थी। जबकि 13,080 मामलों में दीवानी या फौजदारी मुकदमे दायर किए गए थे। किंतु केवल 1605 मामलों में ही दोष सिद्ध हो सका और दोषी को वास्तव में सजा हो पाई थी। लेकिन बाद के वर्षों में नमूने तो ज्यादा भरे गए। मुकदमे भी अधिक दर्ज हुए। लेकिन सजा का ग्राफ घटकर आधा रह गया।
इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 2019-20 में जहां जांच के लिए भेजे जाने वाले नमूनों की संख्या बढ़कर 1,18,775, फेल नमूनों की संख्या बढ़कर 29,589 तथा दीवानी/ फौजदारी मामलों की संख्या 27,412 हो गई। वहीं, सजा केवल 821 मामलों में हुई। इससे पता चलता है कि एफएसएसएआइ अपने काम को गंभीरतापूर्वक अंजाम नहीं दे पा रहा है। एफएसएसएआइ की इस कोताही को चिंताजनक बताते हुए संसदीय समिति ने सीएसी की कार्य प्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।
उसका कहना है कि 9 वर्षों में समिति की केवल 27 बैठकें होना इस बात का सबूत है कि राज्यों के साथ सामंजस्य की कमी है और इसे बढ़ाने के लिए समिति को ज्यादा बैठकें करनी चाहिए। इसके अलावा समिति ने एफएसएसएआइ के क्षेत्रीय कार्यालयों/ प्रयोगशालाओं तथा नाकों की संख्या बढाए जाने की जरूरत भी बताई है। अभी देश के 6 प्रमुख नगरों-दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, तूतीकोरिन तथा कोच्चि में कार्यालय/प्रयोगशालाएं तथा 22 नाके हैं।
