आपातकाल: वह काला दिन, पुरानी बातें याद कर कांप उठती है रूह
मुरादाबाद अमृत विचार। 25 जून 1975 को भारतीय किसान दल (बीकेडी) के मुखिया चौधरी चरण सिंह को सहारनपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद पुलिस और आक्रामक हो गई थी। काली रात कट चुकी थी। सुबह आकाश चीरकर सूरज की रोशनी धरती पर आ रही थी। आकाश लालिमा से दमक रहा …
मुरादाबाद अमृत विचार। 25 जून 1975 को भारतीय किसान दल (बीकेडी) के मुखिया चौधरी चरण सिंह को सहारनपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद पुलिस और आक्रामक हो गई थी। काली रात कट चुकी थी। सुबह आकाश चीरकर सूरज की रोशनी धरती पर आ रही थी। आकाश लालिमा से दमक रहा था। शहर में जगह-जगह गिरफ्तारियां शुरू हो गई थीं। उस दिन को याद करते-करते लोकतंत्र सेनानी संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बाबर खान भावुक हो उठते हैं।
कहते हैं कि करीब डेढ़ माह बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस से बचने के लिए वह पड़ोसी की छत पर सोए थे। तभी पुलिस आई और उन्हें पकड़ कर ले गई। 19 महीने बाद जब भोर के पांच बजे जेल का दरवाजा खुला तो लोकतंत्र के नारों की गूंज के साथ सेनानी बाहर निकले।
आपातकाल के बंदी बाबर खान उस दिन और रात की चर्चा शुरू होते ही अतीत में खो जाते हैं। कहते हैं कि रात काली होती है। लेकिन, वह दिन काला था। 25 जून 1975 का वह दिन डरा जाता है। जब देश में इमरजेंसी लगी थी। कांग्रेसी, मुस्लिम लीग और सीपीआई एक मंच पर थे। पूरा देश दूसरी ओर था।। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीकेडी, सीपीएम सहित अन्य जनसंगठनों के लोग जेल में भेजे जा रहे थे।
कहते हैं कि मौजूदा संभल सांसद डा. शफीर्कुरहमान बर्क, जोया के हरगोविंद सिंह, अमरोहा के चौधरी कांशीराम, मुरादाबाद के मास्टर मुस्लिर्जु हसन, जमात-ए-इस्लामी के इरशाद जाफरी, लाकड़ी वालान के इस्लामिक कैडर के अनवर भाई, अमरोहा के इस्लाम नेता, ठाकुरद्वारा क्षेत्र के सीपीएम सदस्य अहमद हसन कुरैशी, मास्टर भूपेंद्र सिंह, चौधरी चंद्रपाल सिंह, रमाशंकर कौशिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रेम शंकर शर्मा विभिन्न स्थानों से गिरफ्तार कर लिए गए। सरकार की तानाशाही का विरोध पूरे देश पर भारी पड़ा।
उसमें मुझ जैसे अनगिनतों को जेल की हवा खानी पड़ी।समाजवादी बाबर कहते हैं कि बाद में जोया के हरगोविंद सिंह सांसद और विधायक बने। चौधरी कांशी राम एमएलसी चुने गए। जबकि मास्टर हसन बाद में अमेरिका में जाकर बस गए। उस दौर के अब गिने चुने लोग बचे हैं। लेकिन, जो बचे हैं उन्हें कांग्रेसी हुकूमत की ज्यादती पर अब भी खुलकर बोलते हैं।
कहते हैं कि 24 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल लागू हुआ। उसके बाद भी गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। मौजूदा हालात को लेकर कहते हैं कि यह दौर भी अफसोसजनक है। सच तो यह है कि सरकारें जम्हूरियत की अनदेखी कर रही हैं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न हो रहा है। पत्रकार, समाजसेवी जेलों में बंद किए जा रहे हैं। यह दौर भी किसी इमरजेंसी से कम नहीं है।
वह कहते हैं कि कोरोना देश से बहुत कुछ छीना है। केवल महामारी के नाम पर कुर्सी पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। वैक्सीन का संकट है। ऑक्सीजन के लिए लोग मर रहे हैं। लाशें फेंकी जा रही हैं। कफन के कपड़े उतार लिए जा रहे हैं।
यह सब चिंताजनक है। वह कहते हैं कि उस दौर के गिने-चुने लोग बचे हैं। लेकिन, जब कभी मुलाकात होती तो सभी उस दौर को लेकर बोलने से नहीं चूकते। बाबर खान के पास इमरजेंसी के किस्से कई हैं। चर्चा में वह बहुत सारी कहानियों का पन्ना खोलते हैं। बताते हैं कि हमें लोकतंत्र बचाना होगा। लोकतंत्र ही हमारी पहचान है।
