उत्तराखंड में भाजपा ने सातवीं बार बदला अपना सीएम

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

हल्द्वानी, अमृत विचार। तमाम कयासों और अटकलों के बाद आखिरकार पुष्कर सिंह धामी को राज्य की बागडोर सौंप दी गयी है। धामी अब उत्तराखंड के ग्यारहवें नए मुख्यमंत्री हैं। वे खटीमा विधानसभा सीट से विधायक हैं और दो बार खटीमा से विधायक रह चुके हैं। देखा जाए तो अकेले बीजेपी ने ही राज्य में छह …

हल्द्वानी, अमृत विचार। तमाम कयासों और अटकलों के बाद आखिरकार पुष्कर सिंह धामी को राज्य की बागडोर सौंप दी गयी है। धामी अब उत्तराखंड के ग्यारहवें नए मुख्यमंत्री हैं। वे खटीमा विधानसभा सीट से विधायक हैं और दो बार खटीमा से विधायक रह चुके हैं। देखा जाए तो अकेले बीजेपी ने ही राज्य में छह बार अपने मुख्यमंत्रियों को बदला है, अब एक बार फिर सातवीं बार धामी को कमान सौंप नया रिकार्ड बना दिया। भाजपा के इस कृत्य के पीछे एक खास रणनीति मानी जा रही है। देखा जाए तो वर्ष 2000 में जब उत्तराखंड को अलग राज्य घोषित किया गया था, तब बीजेपी के नित्यानंद स्वामी को सीएम पद दिया गया उन्होंने कुछ समय के लिए उस अंतरिम सरकार को संभाला भी, लेकिन फिर एक साल पूरा होने से पहले ही उनकी जगह भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया बताया जाता है कि 2002 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने ये बड़ा फैसला लिया था। लेकिन भाजपा को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।

कांग्रेस ने नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित किया और वे राज्य के एक मात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। उस समय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे हरीश रावत ने कई मौकों पर एनडी तिवारी के खिलाफ नाराजगी व्यक्त की थी और हाईकमान से भी लगातार संपर्क साधा था लेकिन फिर भी एनडी तिवारी ने सूझबूझ से न केवल सरकार को बचाया बल्कि अपना पांच साल का कार्यकाल भी पूरा किया।

2007 में भाजपा ने कांग्रेस को दी शिकस्त

वर्ष 2007 में कांग्रेस को हराकर भाजपा फिर सत्ता में लौटी और मुख्यमंत्री के रूप में मेजर जनरल बीसी खंडूरी को चुना गया। अभी उनके कार्यकाल को महज दो ही साल हुए थे कि ऐसी खबरें आने लगें कि उनसे कई विधायक नाराज हैं और इसी नाराजगी की वजह से उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। इस बार बीजेपी ने मुख्यमंत्री के पद पर डा.रमेश पोखरियाल निशंक को चुना लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव करीब थे, ऐसे में बीजेपी हाईकमान को बीजेपी को निशंक के नेतृत्व पर भी ज्यादा भरोसा नहीं रहा और राज्य में एक बार फिर खंडूरी को जरूरी समझा गया और उनकी वापसी हो गई।

लेकिन उत्तराखंड की जनता ने फिर साल 2002 वाली कहानी को दोहराया और बीजेपी के सीएम बदलने वाले पैंतरे को ही खारिज कर दिया। जब चुनाव परिणाम आए तब बीजेपी ने तो सत्ता गंवाई ही साथ ही जनरल बीसी खंडूरी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। कांग्रेस को फिर राज्य की जिम्मेदारी मिल गई और विजय बहुगुणा को सीएम बना दिया गया।

मुख्यमंत्री बदलने की प्रथा कांग्रेस ने भी नहीं तोड़ी
वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के वक्त सीएम विजय बहुगुणा पर कई सवाल खड़े हुए और उनके प्रबंधन नीतियों को फेल बताया और चौतरफा विरोध झेलने के बाद कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को सीएम पद से हटा दिया और उनकी जगह हरीश रावत को उत्तराखंड की बागडोर सौंप दी गई लेकिन हरीश रावत के लिए सीएम की कुर्सी स्थाई नहीं रही और दो साल बाद ही पार्टी नेताओं ने उनके खिलाफ बगावत कर दी और उनसे नाराज चल रही एक दूसरी लॉबी भाजपा से हाथ मिला बैठी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया हलांकि उस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट से हरीश रावत को राहत मिल गयी, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिल सका।

2017 में बीजेपी ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को बनाया मुख्यमंत्री

2017 में कांग्रेस के हाथ से एक बार फिर सत्ता निकल गयी और भाजपा ने अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई। इस बार बीजेपी ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को बतौर मुख्यमंत्री चुना और उन्होंने चार साल तक का सफर तय भी किया लेकिन ठीक चुनाव से एक साल पहले त्रिवेंद्र से भी सीएम कुर्सी छीन ली गई और कहा गया कि राज्य के कई बीजेपी नेता उनकी कार्यशैली से खुश नहीं थे और उनकी जगह तीरथ सिंह रावत को पदभार सौंप दिया गया।

लेकिन वे सीएम बनते ही अपने बयानों के चलते विवादों से घिर गए और चार महीनों में ही उनका इस्तीफा भी राज्यपाल के हाथ में जा पहुंचा और इसके पीछे की वजह संवैधानिक कारण बताया आखिरकार तीन दिन चली उठापटक के बाद पुष्कर सिंह धामी को महज सात महीने के लिए कुर्सी पर बैठा दिया गया है। अब एक बार फिर उत्तराखंड में चुनाव करीब है, राज्य को फिर नया सीएम मिल गया है, बीजेपी ने अपनी दस साल की सत्ता में सातवीं बार सीएम का चेहरा बदल दिया है देखना होगा की हाईकमान के इस फैसले से भाजपा को कहां और कितना फायदा मिलता है और इस कदम से उसकी राजनीतिक समीकरण सटीक बैठ पाते हैं या नहीं।

संबंधित समाचार