75वीं वर्षगांठ पर 75 फीसद पूरी हो पाएगी गांवों में मकान की योजना

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संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण अपने लक्ष्य से पिछड़ गई है। इसकी रफ्तार को देखते हुए इसके समय पर पूरा होने की संभावना नहीं दिखती है। लेकिन उत्तर प्रदेश उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों के अच्छे प्रदर्शन की बदौलत सरकार आजादी की 75वीं वर्षगांठ यानी 15 अगस्त, 2022 तक 75 फीसद लक्ष्य …

संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण अपने लक्ष्य से पिछड़ गई है। इसकी रफ्तार को देखते हुए इसके समय पर पूरा होने की संभावना नहीं दिखती है। लेकिन उत्तर प्रदेश उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों के अच्छे प्रदर्शन की बदौलत सरकार आजादी की 75वीं वर्षगांठ यानी 15 अगस्त, 2022 तक 75 फीसद लक्ष्य अवश्य पूरा कर सकती है।

प्रधानमंत्री ने 2022 तक सभी को आवास का वादा किया था। इसके लिए जून, 2015 में पुरानी इंदिरा आवास योजना में संशोधन कर उसे प्रधानमंत्री आवास योजना का नया नाम दिया। इसमें भी पहले शहरों में मकानो की कमी दूर करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी लांच की गई थी। जिसके तहत अब तक गरीबों के लिए आवश्यक 50 लाख से ज्यादा मकान बनाए जा चुके हैं। जबकि निम्न व निम्न मध्यम वर्ग के 60 लाख से ज्यादा मकानो का निर्माण प्रक्रियाधीन है।

परंतु शहरों से ज्यादा गांवों में मकान की आवश्यकता को देख सरकार ने अप्रैल, 2016 से गांवों में मकान बनाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण का आगाज किया गया। योजना के तहत गैर-पर्वतीय राज्यों को केंद्र की ओर से 60 फीसद, जबकि पर्वतीय व पूर्वोत्तर राज्यों को 90 फीसद वित्तीय मदद प्रदान की जाती है।

इसके तहत पहले चरण में 2016-17 से लेकर 2018-19 तक के तीन सालों में एक करोड़, जबकि 2019-20 से 2021-22 के तीन सालों में मकान बाकी 1.95 करोड़ मकानों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन योजना शुरू से ही बुरी तरह पिछड़ गई है। इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष अभी तक 2,65,80,394 मकानों के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1,49,61,631 अर्थात करीब 56.29 फीसदी मकान ही बन पाए थे। जबकि बाकी अपूर्ण हैं।

ऐसा योजना के पहले, चौथे और पांचवें साल में बहुत कम काम हो पाने के कारण हुआ। इसमें केवल पांचवां यानी 2020-21 का साल कोरोना से प्रभावित रहा है। जबकि छठे व अंतिम अर्थात चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 के परिणाम भी कोरोना की दूसरी लहर के कारण प्रभावित हुए हैं। पहले यानी 2016-17 में 42,64,470 मकानों के लक्ष्य के विपरीत केवल 2,115 मकान बने। इसके बाद काम ने रफ्तार पकड़ी जिससे 2017-18 और 2018-19 में लक्ष्य से ज्यादा मकानों का निर्माण हुआ। लेकिन उसके बाद अचानक फिर से सुस्ती छा गई और लक्ष्य से बहुत कम काम हो सका।

पीएमएवाई-जी की इस सुस्ती के पीछे कुछ राज्यों का योजना के प्रति गंभीरता न दिखाना या वहां व्यावहारिक अड़चने आना है। ऐसे में या तो उन्हें केंद्र की ओर से योजना का हिस्सा आबंटित ही नहीं हुआ अथवा आबंटित हुआ भी तो उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ। ऐसे राज्यों में कर्नाटक, तेलंगाना व नगालैंड का नाम सबसे ऊपर है।

हालांकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों ने योजना में अच्छा या बेहतर प्रदर्शन किया है। योजना के तहत उत्तर प्रदेश का नाम सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में अव्वल है। यूपी को केंद्र की ओर से 98.6 फीसद राशि मंजूर की गई। जिसकी बदौलत उसने 1,77,1470 यानी लगभग 68 फीसद ग्रामीण मकानो का निर्माण पूरा कर लिया है। जबकि उत्तराखंड ने 100 फीसदी धन स्वीकृति के साथ 12,424 यानी तकरीबन 45 फीसद मकान बना डाले हैं।

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