कानपुर: फर्जी दस्तावेज से फार्मासिस्ट ने पूरी की नौकरी, दर्ज हुआ केस, ऐसे हुआ खुलासा
कानपुर। उत्तर प्रदेश का कानपूर जिले से एक बड़ा फर्जीवाड़ा का मामला सामने आया है। यह मामला कानपुर नगर निगम से सामने आयी है, जहां नगर निगम में एक यूनानी फार्मासिस्ट ने फर्जी दस्तावेजों से पूरी नौकरी कर डाली। ऑडिट टीम ने रिटायरमेंट से एक महीने पहले 2015 में उसका फर्जीवाड़ा पकड़ा। अब जाकर छह …
कानपुर। उत्तर प्रदेश का कानपूर जिले से एक बड़ा फर्जीवाड़ा का मामला सामने आया है। यह मामला कानपुर नगर निगम से सामने आयी है, जहां नगर निगम में एक यूनानी फार्मासिस्ट ने फर्जी दस्तावेजों से पूरी नौकरी कर डाली। ऑडिट टीम ने रिटायरमेंट से एक महीने पहले 2015 में उसका फर्जीवाड़ा पकड़ा। अब जाकर छह साल बाद उसके खिलाफ बेकनगंज थाने में एफआईआर दर्ज हो सकी है। फिलहाल उसके रिटायरमेंट का भुगतान, पेंशन समेत अन्य लाभ रोक दिए गए हैं।
ऑडिट में पकड़ा गया फर्जीवाड़ा गए इस फर्जीवाड़ा के बारे में जानकारी देते हुए नगर निगम के नगर स्वास्थ्य अधिकारी अमित सिंह गौर ने बताया कि बेकनगंज निवासी मो. वसीक नगर निगम में फार्मासिस्ट यूनानी के पद पर तैनात थे। ऑडिट टीम ने मो. वसीक के रिटायरमेंट से एक महीने पहले पाया कि उन्होंने फार्मासिस्ट यूनानी का फर्जी एजूकेशन सर्टिफिकेट लगाकर 1977 में नौकरी हासिल की थी।
रिटायरमेंट के ठीक एक महीने पहले 2015 में ऑडिट की जांच में खुलासा होने के बाद उनका पेंशन, पीएफ समेत अन्य रिटायरमेंट लाभ रोक दिए गए। अब उनके खिलाफ बेकनगंज थाने में धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेजों से नौकरी पाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई है। बेकनगंज थाना प्रभारी ने बताया कि तहरीर के आधार पर एफआईआर दर्ज कर ली गई है। जांच के बाद आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
फार्मासिस्ट का नगर निगम में इतना रसूख था कि पकड़े जाने के छह साल तक नगर निगम में ही उनकी फाइल दबी रही। अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग के दौरान फाइल सामने आने पर नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। नगर निगम में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद कर्मचारियों में चर्चा रही कि छह साल तक फाइल दबी रही और अब कुछ साल जांच में बीत जाएंगे। अब उनकी जिंदगी ही कितनी बची है जो नगर निगम या पुलिस कोई रिकवरी या कार्रवाई कर पाएगी।
नगर स्वास्थ्य अधिकारी अमित सिंह गौर ने बताया कि जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद लखनऊ स्थित आयुर्वेदिक तथा यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड उत्तर प्रदेश से दस्तावेजों की जांच कराई गई। जांच में सामने आया कि 1977 के पहले का यूनानी चिकित्सा का सर्टिफिकेट लगा है, जबकि उस समय यूनानी की यह पढ़ाई होती ही नहीं थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद तत्काल प्रभाव से सेवा समाप्त करने के साथ ही सभी लाभ रोक दिए गए हैं।
