बरेली: 2022 के चुनाव में किसान मांगेंगे ‘अच्छे दिन’ का हिसाब

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बरेली, अमृत विचार। महंगाई को मुख्य मुद्दा बनाकर 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आई। 2017 में यूपी में भी भाजपा की लहर चली और सरकार बनी। 2019 में फिर नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में बनी। सभी चुनावों की रैलियों में एक बात यह कॉमन रही कि किसान के अच्छे दिन आएंगे और उनकी …

बरेली, अमृत विचार। महंगाई को मुख्य मुद्दा बनाकर 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आई। 2017 में यूपी में भी भाजपा की लहर चली और सरकार बनी। 2019 में फिर नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में बनी। सभी चुनावों की रैलियों में एक बात यह कॉमन रही कि किसान के अच्छे दिन आएंगे और उनकी आय दोगुनी होगी।कि सानों को भरोसा भी हुआ, क्योंकि कांग्रेस सरकार में महंगाई बड़ा मुद्दा थी। आमदनी कम खर्च ज्यादा होने से हर कोई बेहाल था, लेकिन केंद्र और यूपी में भाजपा सरकार होने के बावजूद किसानों के दिन नहीं बदले। अब किसानों ने 2022 में अच्छे दिन का हिसाब लेने का मन बना लिया है।

किसानों का कहना है कि 2017 से उम्मीद लगाए थे कि अब अच्छे दिन आएंगे, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इस सरकार में भी महंगाई रिकॉर्ड तोड़ रही है। डीजल-पेट्रोल के दाम रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए किसान बैंकों के कर्जदार बनते जा रहे हैं। जनपद के बड़ी संख्या में ऐसे भी किसान हैं, जिनके पास बैंक की हितकारी योजनाओं की जानकारी नहीं होती, न ही उन्हें बैंक का लाभ मिलता है। वहीं जरूरतों को पूरा करने में बिचौलियों के चंगुल में फंसे रहते हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा की रैलियों में किसानों के हितों को लेकर लंबे-लंबे भाषण दिए गए थे। किसानों को उम्मीद थी कि भाजपा की सरकार बनेगी तो उनकी फसलों का बेहतर मूल्य मिलेगा। गन्ने के दाम बढ़ेंगे। कर्जमाफी योजना का लाभ सभी किसानों को मिलेगा, मगर सरकार का सिस्टम सही न होने से किसानों के लिए अच्छे दिन की शुरुआत नहीं हो पाई। सर्किल रेट से लेकर खेती तक किसानों को सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस वजह से  जिले में करीब साढ़े चार लाख किसानों में से दो लाख से ज्यादा कर्ज में डूबे हुए हैं। इन पर बैंकों का करीब 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। कृषि विभाग से लेकर बैंकों तक दलालों की फौज लगी है। किसान परेशान हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। किसानों के लिए सबसे दुखदायी बात यह है कि इन हालात में फंसे होने पर उनके आंसू पोंछने की बजाय नेता किसानों को खुशहाहल बताकर अपनी कार्य प्रणाली का गुणगान कर रहे हैं।

280 करोड़ उप्र सहकारी ग्राम विकास बैंक बकाया
उप्र सहकारी ग्राम विकास बैंक की 35 शाखाओं ने करीब 55 हजार किसानों को 280 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज दिया था। इसमें 200 करोड़ रुपए का कर्ज लंबे समय बाद भी किसान नहीं लौटा सके हैं। यह आलम तब है, जब बैंक से 5161 बकायदारों की आरसी जारी की जा चुकी है। कुछ इसी तरह का हाल सहकारिता समितियों से लिए गए कर्ज का है। करीब 40 हजार किसानों का 117 करोड़ रुपए का कर्ज सहकारिता विभाग पर है। जानकार बताते हैं कि किसानों को सरकार बदलते ही कर्जमाफी योजना से उम्मीद है, इसलिए वह अपना कर्ज नहीं चुका रहे हैं। लेकिन ऐसे में किसान चक्रवृद्धि ब्याज के दल-दल में फंसता चला जाता है। बाद में कर्ज से मुक्ति पाने के लिए किसान अपनी जमीन बेचता है और बच्चों का पेट पालने के लिए मजबूर हो जाता है।

क्या कहते हैं किसान
किसान सिंटू कश्यप, रजपुरा कला, ने कहा नेता सिर्फ चुनाव के समय ही वोट मांगने आते हैं। जीतने के बाद गांव में दर्शन तक नहीं देते। अच्छी उपज की आस में लिया एक लाख का कृषि लोन लंबे समय बाद भी बकाया है। सरकार किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है, किसान परेशान हैं।

किसान ओमकार, हाफिजगंज ने कहा पचास हजार केसीसी (कृषि ऋण) बकाया है। उपज अच्छी नहीं होने के कारण लोन लिया था। भाजपा की सरकार बनी तो सोचा कर्ज माफी से कुछ राहत मिलेगी। मगर अब तक कोई फायदा नहीं हुआ। आगे भी कोई उम्मीद नहीं लग रही है।

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