विधेयक का विरोध
मानसून सत्र में लाए गए बिजली संशोधन विधेयक 2021 का विरोध बढ़ रहा है। मौजूदा सत्र में जो 17 नए विधेयक पेश करने के लिए सूचीबद्ध किए गए थे, उनमें बिजली (संशोधन) विधेयक भी शामिल रहा है। विधेयक के विरुद्ध कर्मचारी संगठन व विपक्षी दल लगातार आवाज उठा रहे हैं। संसद में विधेयक पारित कराने …
मानसून सत्र में लाए गए बिजली संशोधन विधेयक 2021 का विरोध बढ़ रहा है। मौजूदा सत्र में जो 17 नए विधेयक पेश करने के लिए सूचीबद्ध किए गए थे, उनमें बिजली (संशोधन) विधेयक भी शामिल रहा है। विधेयक के विरुद्ध कर्मचारी संगठन व विपक्षी दल लगातार आवाज उठा रहे हैं। संसद में विधेयक पारित कराने के सरकार के रुख के खिलाफ बिजली कर्मचारी और इंजीनियर 10 अगस्त को देशव्यापी हड़ताल की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।
रविवार को शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि केंद्र का बिजली (संशोधन) विधेयक देशहित में नहीं हैं। विधेयक पर राज्यों के साथ चर्चा नहीं की गई। इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस विधेयक को रोकने का आग्रह किया। केरल में भी इसके खिलाफ आवाज उठ रही है। केरल विधानसभा ने गुरुवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया, जिसमें केंद्र से बिजली (संशोधन) विधेयक, 2021 को वापस लेने की मांग की गई।
बिल के प्रावधानों के मुताबिक विद्युत क्षेत्र में निजी कंपनियां आएंगी। उन्हें उपभोक्ता को चुनने का अधिकार होगा कि वो किसे बिजली दें और किसे न दें। प्रस्तावित विधेयक हर तरह की क्रॉस सब्सिडी खत्म करने और उपभोक्ताओं को दी जाने वाली बिजली की वास्तविक कीमत का भुगतान करने को बाध्य करेगा। ऐसे में खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली की भी वास्तविक कीमत चुकानी पड़ी तो किसानों के सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
राज्य सरकारें भी किसानों को कृषि कार्य के लिए असीमित बिजली इस्तेमाल की छूट नहीं दे सकेंगी। पहले किसान बिल का पूरा भुगतान करेगा। बाद में राज्य सरकारें अगर चाहें तो किसानों को सब्सिडी दे सकती हैं। साथ ही कर्मचारी संगठन आशंका जता रहे हैं कि बिल से सरकारी बिजली वितरण निगमों की हालत बीएसएनएल की तरह हो जाएगी। कर्मचारियों व इंजीनियरों पर छंटनी की तलवार लटक जाएगी। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो इससे राज्य बिजली कंपनियां बुरी तरह प्रभावित होंगी।
हालांकि विद्युत संविधान की समवर्ती सूची में है, इस सूची में शामिल विषय पर केंद्र व राज्य कानून बना सकते हैं। पर पहले व्यापक और पारदर्शी तरीके से विचार-विमर्श होना चाहिए। अब देखना है कि सरकार इस मसले का क्या हल निकालेगी, जबकि वो पहले से ही नए कृषि कानूनों पर घिरी हुई है। व्यापक विरोध के मद्देनजर सरकार को जल्दबाजी में विधेयक को पारित नहीं कराना चाहिए और विधेयक को संसद में रखने से पहले उपभोक्ताओं और बिजली कर्मचारियों सहित बिजली क्षेत्र के मुख्य हितधारकों को विचार देने का उचित मौका दिया जाना चाहिए।
