सामूहिक जिम्मेदारी
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को माना कि सदन को चलाना सरकार एवं विपक्ष दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। पेगासस जासूसी मामले, किसानों के मुद्दे और महंगाई को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका और लोकसभा की कार्यवाही निर्धारित तिथि से …
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को माना कि सदन को चलाना सरकार एवं विपक्ष दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। पेगासस जासूसी मामले, किसानों के मुद्दे और महंगाई को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका और लोकसभा की कार्यवाही निर्धारित तिथि से दो दिन पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करनी पड़ी।
लोकसभा अध्यक्ष ने संसद के मानसून सत्र की उत्पादकता महज 22 प्रतिशत रहने पर खेद प्रकट किया। इस सत्र में गतिरोध के कारण केवल 21 घंटे ही कामकाज हो सका। सदस्यों के हंगामे के कारण 74 घंटे 46 मिनट कामकाज बाधित हुआ। राज्यसभा में सभापति एम वेंकेया नायडू ने मंगलवार की घटना पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि संसदीय परंपराओं को ताक पर रखने के लिए मानो होड़ सी मची हुई है। मंगलवार को कुछ सदस्यों ने आधिकारिक मेज पर चढ़ कर काले कपड़े लहराए और कुछ दस्तावेज फेंके।
आधिकारिक मेज पर राज्यसभा के महासचिव और अधिकारी काम करते हैं। मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में विपक्ष सरकार की एक सुनने के लिए तैयार नहीं हुआ और सरकार भी झुकने के लिए तैयार नहीं दिखी। संसद को चलाना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन यदि विपक्ष उसे न चलने देने पर आमादा हो जाए तो कुछ नहीं किया जा सकता।
संसद को सुचारू ढंग से चलाने के लिए सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की राय का सम्मान करे। जिस तरह से राजनीति और सार्वजनिक जीवन में मूल्यों में गिरावट आई है, उसी तरह से संसद की कार्यवाही का स्तर भी पहले के मुकाबले काफी नीचे आया है। संसद में सांसदों का जैसा आचरण देखने में आ रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि विरोध प्रदर्शन करने का एकमात्र तरीका असंसदीय आचरण और संसद की कार्यवाही ठप करने को माना जाने लगा है।
जबकि संसद विरोध प्रदर्शन की नहीं बल्कि मुद्दों पर चर्चा की जगह है। पहले संसद में बहस का स्तर भी काफी ऊंचा होता था और पक्ष हो या विपक्ष, सभी का अधिक जोर नीतियों पर चर्चा करने पर रहता था लेकिन पिछले एक दशक में स्थिति में बदलाव आया है। संसदीय लोकतंत्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। प्रमुख राजनीतिक दलों को संसदीय कामकाज के महत्व का एहसास नहीं रह गया है। सत्तारूढ़ दल विपक्ष को साथ लेकर चलने की ईमानदार कोशिश करे और बहुमत के दंभ को छोड़ दे, तो भविष्य में कोई राह निकाल सकती है।
