बरेली: यूनियन जैक उतारकर शांति शरण विद्यार्थी ने फहरा दिया था तिरंगा

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बरेली, अमृत विचार। अपना शहर ऐसे वीर सपूतों का गवाह रहा है जिन्होंने हर स्तर पर जाकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया। ऐसा ही एक नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति शरण विद्यार्थी का भी है जिन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान केडीईएम इंटर कॉलेज से अंग्रेजों के यूनियन जैक को …

बरेली, अमृत विचार। अपना शहर ऐसे वीर सपूतों का गवाह रहा है जिन्होंने हर स्तर पर जाकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया। ऐसा ही एक नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति शरण विद्यार्थी का भी है जिन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान केडीईएम इंटर कॉलेज से अंग्रेजों के यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहरा दिया था। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश भर के अंदर अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो चुका था। उन दिनों शांति शरण विद्यार्थी केडीईएम इंटर कॉलेज में पढ़ाई करते थे। अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के प्रण के साथ वह भी इस आंदोलन में शामिल हो गए। 9 अगस्त को उन्होंने स्कूल पर फहरा रहे यूनियन जैक को उखाड़ फेंका और वहां तिरंगा फहरा दिया। झंडा फहराने के बाद जुलूस लेकर कोतवाली तक पहुंचे लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

शांति शरण विद्यार्थी, स्वंतंत्रता संग्राम सेनानी

इस आंदोलन में उनके साथ महानंद सेवक, कृष्ण मुरारी असर, प्रताप चंद्र आजाद, दीना नाथ मिश्र , नौरंग लाल और धर्म दत्त वैद्य जैसे स्वतंत्रता सेनानी भी थे जिन्हें एक ही बैरक में रखा गया। जेल जाने के कारण उनकी पढ़ाई तक छूट गई थी। हालांकि ढाई महीने बाद उन्हें सेंट्रल जेल से रिहा किया गया।

1921 में बरेली के अधिवक्ता राघव राम वर्मा के घर जन्मे शांति शरण विद्यार्थी उनके मंझले बेटे थे। आजादी के आंदोलन के बाद करीब 40 साल तक पूर्वोत्तर रेलवे के भंडार लेखा विभाग में उन्होंने नौकरी की। 4 मई 2013 को उनका निधन हो गया। वह अपने अंतिम समय तक सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहे।

नेता सुभाष चंद्र बोस को पंखा झलकर की थी सेवा
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका गुस्सा किशोरावस्था में ही पनपना शुरू हो गया था। यही वजह थी कि वह कम उम्र में ही श्रद्धा नंद सेवक दल के साथ जुड़ गए और क्रांतिकारियों को सूचनाएं पहुंचाने में सहयोग करने लगे। क्रांतिकारी नेताओं के पद चिन्हों पर चलने और उनकी शरण में रहने की भावना को इसी बात से समझा जा सकता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बरेली आगमन पर उन्होंने पंखा झलकर उनकी सेवा की थी।

आजादी के बाद के माहौल से थे दुखी
उनके बेटे चार्टेड अकाउंटेंट राजन विद्यार्थी बताते हैं कि आजादी के बाद पिता देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार से बेहद दुखी रहे। वह कहा करते थे कि इस दिन के लिए देश को आजाद नहीं कराया गया था। उनका मानना था कि आजादी के बाद भारतीय नागरिक अपने कर्तव्यों को भूल रहा है और देश की सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति मान रहा है जो बेहद गलत है।

स्वतंत्रता सेनानियों के मिलने वाली सुविधाएं नहीं की स्वीकार
आजादी की रजत जयंती पर साल 1972 में उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने ताम्र पत्र भेंट किया लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवार को मिलने वाले कोटे समेत किसी भी प्रकार के आरक्षण को स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि आजादी की लड़ाई उन्होंने इसलिए नहीं लड़ी थी। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा उनकी जिंदगी के सबसे बड़े उसूल थे।

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