जांच अधिकारी द्वारा प्रमाणित केस डायरी की मूल प्रति ही स्वीकार्य- अदालत
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य के महाधिवक्ता को किसी भी केस डायरी को तब तक स्वीकार न करने का निर्देश दिया है, जब तक कि वह विवेचना अधिकारी द्वारा प्रमाणित न हो। पोक्सो अधिनियम के तहत एक कॉन्स्टेबल आरोपी ने दावा किया कि वह अपराध के समय अपनी ड्यूटी पर तैनात था। …
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य के महाधिवक्ता को किसी भी केस डायरी को तब तक स्वीकार न करने का निर्देश दिया है, जब तक कि वह विवेचना अधिकारी द्वारा प्रमाणित न हो। पोक्सो अधिनियम के तहत एक कॉन्स्टेबल आरोपी ने दावा किया कि वह अपराध के समय अपनी ड्यूटी पर तैनात था।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर भरोसा किया जाए, तो वह ट्रैफिक पुलिस कर्मी के रूप में ड्यूटी पर था और उसकी ड्यूटी का समय गाजियाबाद में 3:00 से 10:00 तक का था, लेकिन उसे दोपहर 2:00 बजे ड्यूटी के लिए भेज दिया गया था। हालांकि दूसरी ओर निजी प्रतिवादी के अधिवक्ता का तर्क था कि विवेचना अधिकारी की जांच के अनुसार आरोपी के मोबाइल नंबर की लोकेशन घटनास्थल के करीब पाई गई है, जब सरकारी वकील को केस डायरी के साथ संलग्न पर्चा संख्या एससीडी 2 की एक प्रति प्रदान करने के लिए कहा गया था, लेकिन यह पाया गया कि पूरी केस डायरी महाधिवक्ता के कार्यालय में नहीं भेजी गई है।
अतः न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्देश दिया कि महाधिवक्ता का कार्यालय किसी भी केस डायरी को तब तक स्वीकार न करें, जब तक कि मामले के जांच अधिकारी द्वारा एक प्रमाण पत्र संलग्न न किया गया हो कि वह केस डायरी की एक पूर्ण मूल्य सही प्रति प्रस्तुत कर रहा है, जिसमें सभी पृष्ठ हैं। दस्तावेजों का एक सूचकांक जो केस का हिस्सा बनता है और यदि यह पाया जाता है कि अधूरी केस डायरी को जांच अधिकारी के समर्थन के बिना स्वीकार किया गया है, तो इसके लिए महाधिवक्ता कार्यालय जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, क्योंकि इससे न्यायालय को असुविधा होती है और उसका कीमती समय बर्बाद होता है।
उक्त आदेश न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकल पीठ ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति सभी पुलिस अधीक्षकों को तत्काल अनुपालन के लिए भेज दी जाए।
