पुण्यतिथि विशेष: तीन गायिकाओं के मुरीद थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने दौर की तीन गायिकाओं के मुरीद थे। उनमें पहली थी बनारस की रसूलन बाई। किशोरावस्था में वे बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ काशी के बालाजी मंदिर में रियाज़ करने जाते थे। रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई का कोठा पड़ता था। वे अक्सर बड़े भाई से छुपकर कोठे पर …
शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने दौर की तीन गायिकाओं के मुरीद थे। उनमें पहली थी बनारस की रसूलन बाई। किशोरावस्था में वे बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ काशी के बालाजी मंदिर में रियाज़ करने जाते थे। रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई का कोठा पड़ता था। वे अक्सर बड़े भाई से छुपकर कोठे पर पहुंच जाते।
जब रसूलन गाती थीं तो वे मुग्ध होकर उन्हें सुनते। रसूलन की खनकदार आवाज़ में हर रोज़ नए राग. ठुमरी, टप्पे और दादरा सुनकर उन्होंने भाव, खटका और मुर्की सीखी थी। एक दिन भाई ने उनकी चोरी पकड़ने के बाद जब कहा कि ऐसी नापाक जगहों पर आने से अल्लाह भी नाराज़ होता है तो उनका जवाब था – दिल से निकली आवाज़ में भी कहीं पाक और नापाक होता है ? उस्ताद रसूलन बाई को बहुत संम्मान के साथ याद करते थे।
जवानी के दिनों में लता मंगेशकर और बेगम अख्तर उनकी प्रिय गायिकाएं थीं। लता को वे देवी सरस्वती का रूप कहते थे। उन्होंने बताया कि लता के गायन में त्रुटियां निकालने की उन्होंने बहुत कोशिशें की, लेकिन असफल रहे। लता जी का एक गीत ‘हमारे दिल से न जाना, धोखा न खाना’ वे अक्सर गुनगुनाया करते थे।
बेगम अख्तर उनकी तीसरी प्रिय गायिका थीं जिनकी गायिकी को वे एक त्रुटि के लिए पसंद करते थे। एक बार लाउडस्पीकर पर देर रात दूर से आ रही एक आवाज़ ने उन्हें चौंकाया था। ग़ज़ल थी- ‘दीवाना बनाना है, तो दीवाना बना दे’ और आवाज़ थी बेगम अख्तर की। बेगम अख़्तर जब ऊंचे स्वर पर जाती थीं तो एक ख़ास जगह पर उनकी आवाज़ टूट जाया करती थी।
संगीत की दुनिया में इसे ऐब समझा जाता है, लेकिन उस्ताद को बेगम का यह ऐब बहुत भाता था। वे बेगम को सुनते वक़्त उसी ऐब वाले लम्हे का इंतज़ार करते थे। वह लम्हा आने पर उनके मुंह से एक ही आवाज़ निकलती थी – अहा !
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