अयोध्या: गृह जनपद लौटे मोहम्मद शरीफ का हुआ भव्य स्वागत, घर पर लगा बधाई देने वालों का तांता
अयोध्या। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मोहम्मद शरीफ के कंधे को सहलाते हुए कहा ‘शरीफ बाबा’ आपने इन्हीं कंधों से न जाने कितने हिन्दू-मुस्लिमों को मोक्ष दिलवाया है। आपके जैसा महान भाव आज तक नहीं देखा। मैं आपकी बहुत कद्र करता हूं।’ यह बातें गृह जनपद लौट कर आए शरीफ चचा बता ही रहे थे कि …
अयोध्या। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मोहम्मद शरीफ के कंधे को सहलाते हुए कहा ‘शरीफ बाबा’ आपने इन्हीं कंधों से न जाने कितने हिन्दू-मुस्लिमों को मोक्ष दिलवाया है। आपके जैसा महान भाव आज तक नहीं देखा। मैं आपकी बहुत कद्र करता हूं।’ यह बातें गृह जनपद लौट कर आए शरीफ चचा बता ही रहे थे कि उनकी आंखें आंसुओं से डबडबा आईं। उन्होंने 28 वर्षों की समाजसेवा के बाद पद्मश्री सम्मान मिलने के लिए जनपदवासियों का शुक्रिया अदा किया।
इसके बाद कहा कि मरते दम तक लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार करता रहूंगा। बुधवार को ट्रेन की फर्स्ट क्लास बोगी से अयोध्या कैंट जंक्शन पहुंचे मोहम्मद शरीफ का पलक पावड़े बिछाये लोगों ने भव्य स्वागत कर पद्मश्री को गले से लगा लिया। लाशों के मसीहा कहे जाने वाले शरीफ चचा के घर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। बड़े-बड़े नेताओं व मीडिया कर्मियों का जमघट है। चचा ने बताया कि सम्मान मिलने की घोषणा पहले ही हो गई थी, लेकिन कोरोना के कारण मिल न सका था।

7 नवंबर को गृह मंत्रालय से फोन आया कि आपको दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में सम्मान लेने की लिए पहुंचना है। शरीफ अपने पोते शब्बीर और छोटे बेटे अशरफ को लेकर लखनऊ से फ्लाइट से दिल्ली निकल गए। वहां उनके रहने-खाने की दिव्य व्यवस्था थी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति भवन में सम्मान के लिए जैसे ही उनके नाम को पुकारा गया तो राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद खुद मेरे पास आ पहुंचे और पद्मश्री सम्मान देकर अलंकृत किया। उन्होंने कहा आपके जैसा जिंदादिल इंसान मैंने अभी तक नहीं देखा।
आपके कार्य हिन्दू-मुस्लिम करने वालों के लिए एक नसीहत है। इस दौरान वहां प्रोजेक्टर पर मेरे कार्यों को दिखाया भी जा रहा था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आये और उन्होंने मेरे स्वास्थ के बारे में जाना। दरअसल 80 वर्षीय शरीफ के पैरों में तकलीफ होने के कारण चलने-फिरने में दिक्कत होती है। फिर भी वह कहते हैं कि मैं अपने काम को मरते दम तक जारी रखूंगा और आगे अपने परिवार को भी इसमें लगाऊंगा।
किराए के मकान में रहता है चचा का परिवार, आर्थिक मदद की दरकार..
बता दें कि रिकाबगंज में साईकल बनाने का काम करने वाले शरीफ चचा खिड़की अली बेग मोहल्ले में आज भी वक्फ की भूमि पर किराए पर रहते हैं। उनको इस बात का आज भी मलाल है कि उनके पास अपना खुद का मकान नहीं है और न ही कमाई का और कोई साधन। दो बेटे प्राइवेट नौकरी कर गुजर बसर कर रहे हैं। घर की माली हालत भी ठीक नहीं है। शरीफ ने इसके लिए सरकार से पेंशन और एक मकान की मांग की है। इसके लिए उन्होंने अपनी बात राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक भी पहुंचाई है। उन्हें आश्वासन दिया गया है कि जल्द ही आपके लिए कुछ किया जाएगा। हालांकि शरीफ कहते हैं कि मेरी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद मैंने आज तक किसी से एक पैसे नहीं मांगे।
जानिए क्यों बन गए लावारिश लाशों के मसीहा
दरअसल, मोहम्मद शरीफ के 25 वर्षीय बड़े बेटे मोहम्मद रईस की सुल्तानपुर में मौत हो गई थी। उसकी लाश को लावारिस समझकर गोमती नदी में फेंक दिया गया था। हालांकि, बाद में पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए उनके बेटे की शर्ट के कॉलर के नीचे लगे हुए स्टीकर से शरीफ को खोजा था। उसी दिन के बाद से मोहम्मद शरीफ ने तय किया कि कोई भी लावारिस लाश हो उसका अंतिम संस्कार वो करेंगे। वो अब तक तीन हजार हिंदुओं और 2 हजार मुस्लिम लाशों के धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार कर चुके हैं। हिंदुओं को जमथरा व मुस्लिमों का ताड़ की तकिया में अंतिम संस्कार करते हैं। शवों को लाने व ले जाने के लिए दो रिक्शे वालों का खर्च भी अपनी जेब से करते हैं। हिंदुओं के हर शव को तीन क्विंटल लकड़ियों पर जलाते हैं।
पैसा नहीं बस दुआ करिए…
चाचा ने बताया कि कई बार ऐसा हुआ है कि लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार करने के बाद उनके परिजन आकर हमसे मुलाकात करते हैं और कहते हैं कि आपने बहुत ही नेक काम किया है। वह पैसे देने लगते हैं तो मैं कहता हूं कि मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस दुआ कीजिये कि मृतक की आत्मा को शांति मिले और मैं इस तरह से जनसेवा करता रहूं।
