पराली के संबंध में किसानों को जागरूक करने में जुटा झांसी प्रशासन

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झांसी। सर्दियों के आगमन के साथ पराली जलाये जाने की बढ़ती घटनाओं के बीच उत्तर प्रदेश का झांसी जिला प्रशासन किसानों को लगातार पराली न जलाने को लेकर जागरूक कर रहा है। साथ ही उन्हें झांसी प्रशासन पराली के निस्तारण के आर्थिक रूप से उपयोगी तरीकों के बारे में भी समझाने के प्रयास में लगा …

झांसी। सर्दियों के आगमन के साथ पराली जलाये जाने की बढ़ती घटनाओं के बीच उत्तर प्रदेश का झांसी जिला प्रशासन किसानों को लगातार पराली न जलाने को लेकर जागरूक कर रहा है। साथ ही उन्हें झांसी प्रशासन पराली के निस्तारण के आर्थिक रूप से उपयोगी तरीकों के बारे में भी समझाने के प्रयास में लगा है।

इसी क्रम में जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने सोमवार को एकबार फिर किसानों को खेत में पराली/फसल के अवशेषों को न जलाये जाने के उद्देश्य से जागरुक करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश में अब ऐसी तकनीकें विकसित हो चुकी हैं, जिससे पराली को बेचकर कमाई की जा सकती है। पराली का अब कई तरह से उपयोग हो रहा है। जिससे नये उत्पादों से उद्योग को बढ़ावा, खेतों में उर्वरता, मशरुम की खेती, चारे में उपयोग और बिजली उत्पादन आदि प्रमुख है।

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जिलाधिकारी ने फसल अवशेष (पराली) की जानकारी देते हुये बताया कि धान के पुआल में पाये जाने घटकों में सिलिका, लिग्निन, सेलूलोज, हेमिसेलूलोज, निम्न पाचन शक्ति 40 फीसदी व उच्च कार्बन नत्रजन 90 फीसदी होता है, जो खेत के लिये काफी लाभदायक सिद्व हो सकता है। किसानों को जागरुक करते हुये उन्हें प्रेरित करना होगा कि वह पराली जलाने से हो रहे प्रदूषण को रोककर अब एक नया रास्ता अपनाये और प्रदेश हित में योगदान देना सुनिश्चित करें। समर एग्री वेंचर्स नामक कम्पनी ने धान, गेंहू और गन्ने जैसी फसलों के अपशिष्टों को 10-14 दिनों में जैविक रुप से अपघटित करने के लिये कई सूक्ष्म जीवों को मिलाकर तकनीकी विकसित कर डिकोम्प एक्टिविटी नामक स्प्रे बनाया है।

जिसमें एरोबिक, माइक्रोएसेफिलिक और ऑयल इम्पोसिंग बैक्टीरिया शमिल है। वहीं, पराली से खाद हर किसान देसी तरीके से भी तैयार कर सकते हैं और उस खाद से कृषि योग्य भूमि को उपजाऊ बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि पराली से कम्पोस्ट खाद बनाने के लिये एक गहरा गढ्ढा लेकर उसमें पुआल (पराली) की परत जिसे पानी लगाकर नम कर दें। साथ ही उन्होंने कहा कि इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है, बल्कि इसके इस्तेमाल से खेत की नमी और मित्र कीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। प्रदूषण की इतनी बड़ी समस्या को हल करने वाली यह एक कमाल की खोज है।

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