सांकेतिक कदम

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Edited By Amrit Vichar
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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी है। वहीं लगातार 21 वें दिन बुधवार को घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया। महामारी के समय में ऊर्जा क्षेत्र में भारी उतार चढ़ाव देखा गया। लाकडाउन के चलते तेल की मांग में जबर्दस्त कमी आई और …

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी है। वहीं लगातार 21 वें दिन बुधवार को घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया। महामारी के समय में ऊर्जा क्षेत्र में भारी उतार चढ़ाव देखा गया। लाकडाउन के चलते तेल की मांग में जबर्दस्त कमी आई और तेल उत्पादकों ने उत्पादन घटा दिया था।

2021 में जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियां तेज होने लगी, पेट्रोलियम पदार्थों की मांग बढ़ने लगी। पेट्रोल-डीजल की डिमांड में तेजी के बीच तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं करने का फैसला किया, इस कारण देल के दाम बढ़ गए। भारत लगातार तेल उत्पादक (ओपेक) देशों से उत्पादन में तेजी लाने की अपील करता रहा। लेकिन इन देशों का कहना रहा कि वो अपने उत्पादन को धीरे-धीरे और सीमित मात्रा में ही बढ़ाएंगे।

ऐसे में अमेरिका ने मंगलवार को पेट्रोल के दाम कम करने के लिए अपने रणनीतिक भंडार से पांच करोड़ बैरल कच्चा तेल जारी करने की घोषणा की। अमेरिका ने भारत, चीन जापान, ब्रिटेन और दक्षिण कोरियों को भी ऐसा करने के लिए मना लिया। भारत ने अपने संरक्षित कोटे से 50 लाख बैरल तेल जारी करने की घोषणा की। अपनी तरह की इस पहली और अनोखी पहल का मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को नीचे लाना है।

कच्चे तेल के प्रमुख उत्पादकों की कोशिश है कि इसके दाम बढ़ाने के लिए बाज़ार को नियंत्रण में रखा जाए। भारत जिन देशों से कच्चा तेल आयात करता है उनमें इराक़, सऊदी अरब, ईरान, वेनेज़ुएला शामिल हैं। ये ओपेक के संस्थापक सदस्य देश भी हैं। कहा जा सकता है कच्चे तेल निर्यातक देशों को नाथने के लिए ऐसी कवायद दुनिया में पहली बार की गई है। निश्चित रूप से सरकार के इस फैसले बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ेगी। भारत का रणनीतिक तेल भंडार 3.8 करोड़ बैरल का है और यह देश के पूर्वी एवं दक्षिण तट पर स्थित है।

दरअसल, दुनिया के बड़े देश ऊर्जा संकट व तेल आपूर्ति में बाधा की आशंका के चलते नब्बे दिनों के लिए आपातकालीन भंडारण रखते हैं। इस संकट को दूर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना की गई थी। इसके तीस सदस्यों में भारत भी शामिल है। देखना होगा कि ओपेक देश इसे किस रूप में लेते हैं।

जिसका खुलासा आगामी 2 दिसंबर को होने वाली बैठक से लग सकेगा, जिसमें वे जनवरी के लिए अपनी उत्पादन योजना को अंतिम रूप देंगे। हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है कि इस पहल से तेल की क़ीमत में ख़ासी कमी हो पाएगी या यदि ऐसा होता भी तो इसका कितना स्थायी प्रभाव हो पाएगा। फिलहाल यह एक सांकेतिक कदम कहा जा सकता है।