बढ़ती असमानता
कोविड-19 महामारी और उसके बाद आए आर्थिक संकट ने वैश्विक स्तर पर सभी देशों को प्रभावित किया, लेकिन इसके कारण सभी देश अलग-अलग स्तर पर प्रभावित हुए हैं। हाल ही में जारी ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ के अनुसार भारत अब दुनिया के सर्वाधिक असमानता वाले देशों में शामिल हो गया है। यहां एक ओर गरीबी …
कोविड-19 महामारी और उसके बाद आए आर्थिक संकट ने वैश्विक स्तर पर सभी देशों को प्रभावित किया, लेकिन इसके कारण सभी देश अलग-अलग स्तर पर प्रभावित हुए हैं। हाल ही में जारी ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ के अनुसार भारत अब दुनिया के सर्वाधिक असमानता वाले देशों में शामिल हो गया है। यहां एक ओर गरीबी बढ़ रही है तो दूसरी ओर एक समृद्ध वर्ग और ऊपर बढ़ता जा रहा है। यह रिपोर्ट ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ द्वारा जारी की गई है।
जिसका उद्देश्य वैश्विक असमानता गतिशीलता पर अनुसंधान को बढ़ावा देना है। देश में वर्ष 2021 में एक फीसदी आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 22 फीसदी हिस्सा है जबकि निचले तबके के पास 13 फीसदी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में लैंगिक असमानता बहुत अधिक है। इसमें कहा गया है, ‘महिला श्रमिक की आय की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत है। यह एशिया के औसत (21 प्रतिशत, चीन को छोड़ कर) से कम है।
रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में आजादी से पहले के समय में आर्थिक असमानता अधिक थी। देश की 50 प्रतिशत आमदनी पर केवल 18 प्रतिशत लोगों का कब्जा था। आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाएं शुरू होने पर यह आंकड़ा कम होकर केवल 35 से 40 प्रतिशत तक आ गया। पंचवर्षीय योजनाओं का महत्व वर्ष 1991 में उदारीकरण का दौर आने के बाद घटने लगा। यहीं से अमीरों की सख्या में बढ़ोतरी होना शुरू हो गई। भारत में अपनाए गए आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की नीतियों से शीर्ष एक प्रतिशत लोग ही लाभान्वित हुए। हालांकि 1980 के दशक से ही विश्व के तमाम देशों में आमदनी और संपत्ति की असमानता बढ़ने लगी थी।
अमेरिका और रूस में तेजी से उदारीकरण और विनियमन कार्यक्रम क्रियान्वित किए गए जबकि चीन, यूरोपीय देशों व भारत में इनकी रफ्तार कम थी। कुल मिलाकर यह रिपोर्ट वैश्विक असमानताओं को ट्रैक करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयासों का अपडेटेड संश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसके अलावा ऑक्सफैम इंडिया द्वारा जारी रिपोर्ट ‘इंडिया इनइक्वेलिटी रिपोर्ट 2021’ से पता चलता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं हैं और नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, भारत में प्रत्येक चार में से एक व्यक्ति बहुआयामी गरीब था।
कहा जा सकता है कि उदारीकरण और विनियमन कमजोर वर्ग के लोगों को प्रतियोगिता में हाशिए पर धकेल देता है। नियोजित विकास की अनदेखी के नुकसान ज्यादा होते हैं। इसलिए योजनाओं के जरिए विकास की अवधारणा को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
