जिम्मेदारी समझनी होगी
संसद का शीतकालीन सत्र बुधवार को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों के निलंबन का मुद्दा छाया रहा। साथ ही गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा को हटाने की मांग उठती रही। सदन में हंगामा और सत्ताधारी तथा विपक्षी दलों के बीच के रिश्तों की कड़वाहट के चलते इस सत्र …
संसद का शीतकालीन सत्र बुधवार को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों के निलंबन का मुद्दा छाया रहा। साथ ही गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा को हटाने की मांग उठती रही। सदन में हंगामा और सत्ताधारी तथा विपक्षी दलों के बीच के रिश्तों की कड़वाहट के चलते इस सत्र की गिनती बुरे सत्रों में होगी। राज्यसभा के 12 सदस्यों को सत्र के पहले दिन निलंबित कर दिया गया। वे पूरे सत्र सदन की कार्यवाही में शामिल न हो सके, क्योंकि उन्हें मॉनसून सत्र में अनुचित व्यवहार के कारण निलंबित कर दिया गया था। विपक्ष का मानना रहा कि उनका निलंबन विधि विरुद्ध था।
विपक्ष इन सदस्यों का निलंबन वापस लेने की मांग कर हंगामा करता रहा जबकि सरकार अड़ी रही कि जब तक निलंबित सदस्य माफी नहीं मांगेंगे तब तक उनका निलंबन रद नहीं किया जाएगा। इसी वजह से सदन में सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध बना रहा। हालांकि सत्र के दौरान दोनों सदन कई बार स्थगित हुए लेकिन कुछ काम भी हुआ। उच्च सदन के सभापति एम वेंकैया नायडू ने कहा सदन में जो कुछ भी हुआ है वह ठीक नहीं है। सदन अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर सका। सत्र के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसका एहसास सदस्यों को होना चाहिए।
राज्यसभा के माहौल ने लोकसभा पर भी असर डाला। हालांकि लोकसभा में सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच चली तनातनी के बावजूद कुछ कामकाज हुआ। सत्र के दौरान नौ विधेयक पारित हुए। लोकसभा में देश में ‘कोविड-19 वैश्विक महामारी’ और ‘जलवायु परिवर्तन’ के संबंध में दो अल्पकालिक चर्चाएं भी की गईं। 2 दिसंबर को सभा का कार्यनिष्पादन दो सौ चार प्रतिशत रहा। लोकसभा का कुल कार्य निष्पादन 82 प्रतिशत रहा। लोकसभा में सदस्यों के व्यवधान के कारण 82 घंटे 48 मिनट का समय व्यर्थ हुआ।
स्वस्थ लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच संवाद और समझौतों की भावना अहम है। जानकारों का कहना है कि राज्यसभा के गतिरोध को दूर किया जा सकता था।
पूरे सत्र के दौरान सरकार कहती रही कि सदन चलाने में विपक्ष को भी सहयोग करना चाहिए और विपक्ष कहता रहा कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में सरकार को विपक्ष के आक्रामक रुख का तथ्यों के आधार पर मुकाबला करना चाहिए था। कहा जा सकता है कि शीतकालीन सत्र निराश करने वाला रहा। इस सत्र की घटनाओं से साफ संदेश मिला है कि राजनीतिक दलों के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। दीर्घावधि में यह दो दलीय भावना को कमजोर करेगी, जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है।
