छापे पर राजनीति

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Edited By Amrit Vichar
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कानपुर के इत्र कारोबारी पीयूष जैन के ठिकानों से बरामद करोड़ों की नकदी पर राजनीतिक बयानबाजी व घमासान जारी है। भाजपा वाले कह रहे हैं कि वह समाजवादी पार्टी का है व सपा नेता कह रहे हैं, पीयूष भाजपा से जुड़ा है। दरअसल गत 9 नवंबर को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी …

कानपुर के इत्र कारोबारी पीयूष जैन के ठिकानों से बरामद करोड़ों की नकदी पर राजनीतिक बयानबाजी व घमासान जारी है। भाजपा वाले कह रहे हैं कि वह समाजवादी पार्टी का है व सपा नेता कह रहे हैं, पीयूष भाजपा से जुड़ा है। दरअसल गत 9 नवंबर को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यालय में समाजवादी इत्र को लांच किया था। यादव ने कहा कि इसे 2022 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बनाया गया है।

इसके बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुछ करीबी लोगों पर आयकर विभाग की छापेमारी हुई। आयकर विभाग और डीजीजीआई द्वारा की गई छापेमारी में कानपुर के कारोबारी के ठिकानों से 257 करोड़ रुपये नकद व सोना-चांदी बरामद की गई है। कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताया गया। सबसे पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने सपा पर राजनीतिक हमला बोला।

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि सपा और बसपा नेता इसीलिए नोटबंदी का विरोध कर रहे थे, क्योंकि उनके करीबियों के घरों की दीवारों में नोट जो भरे थे। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कानपुर से और गृह मंत्री अमित शाह ने हरदोई से इस मुद्दे को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधा। छापेमारी और इसमें समाजवादी पार्टी का नाम उछाले जाने के बाद अखिलेश यादव ने जवाबी हमला बोला। अखिलेश ने कहा कि डिजिटल गलती की वजह से भाजपा ने गलत जगह छापा मरवा दिया। समाजवादी इत्र तो पुष्पराज जैन ने बनाया था।

इस तरह पीयूष जैन राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र बन गए हैं। जबकि इस छापेमारी को राजनैतिक नजरिए से देखा जाना ही गलत है। पीयूष जैन चाहे किसी भी दल के हों, सच्चाई ये है कि काले धन की बड़ी मात्रा में बरामदगी हुई है और इस अवैध कारोबार में शामिल होने वाले हरेक दोषी को सजा मिलनी चाहिए।

खास बात ये है कि ये छापेमारी नोटबंदी के बाद वाले भारत में हुई है। नोटबंदी काले धन की रोकथाम के लिए ही लागू की गई थी। अब स्थिति ये है कि कुछेक लाख के लेन-देन या बैंक से नकदी निकालने के लिए कई तरह की कागजी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। जबकि ईमानदारी से कर जमा करने वाले भी सरकार की कड़ाई से परेशान होते हैं। लेकिन आज भी ऐसे लोग हैं, जो घर पर सैकड़ों करोड़ नकदी और कई किलो सोना-चांदी लेकर आराम से बैठे रहते हैं।

बयानबाजी मात्र से किसी की भी जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। जवाब देना होगा कि पांच साल तक इस अवैध धन की भनक क्यों नहीं मिल पाती। यहां सवाल सत्ता और चुनावों से अधिक देशहित का है। चूंकि नोटबंदी को भी देशभक्ति से जोड़कर पेश किया गया था।