कोरोना का मंथन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देश में कोरोना वायरस से उत्पन्न स्थितियों की समीक्षा की। इससे पहले प्रधानमंत्री ने 24 दिसंबर को भी ऐसी ही बैठक की थी। यह समीक्षा बैठक ऐसे समय में हुई है, जब दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े महानगरों और तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में कोरोना के मामले पिछले 15 दिनों …
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देश में कोरोना वायरस से उत्पन्न स्थितियों की समीक्षा की। इससे पहले प्रधानमंत्री ने 24 दिसंबर को भी ऐसी ही बैठक की थी। यह समीक्षा बैठक ऐसे समय में हुई है, जब दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े महानगरों और तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में कोरोना के मामले पिछले 15 दिनों में तेजी से बढ़े हैं। एक दिन में संक्रमितों की संख्या डेढ़ लाख से ऊपर हो गई। इस बीच चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का ऐलान भी कर दिया है।
पिछले 11 दिनों में 22 गुना मामले बढ़े हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत बड़े शहरों में सबसे ज्यादा संक्रमण सामने आ रहा है। एम्स, आरएमएल समेत दिल्ली के कई अस्पतालों, संसद भवन के 400 कर्मचारी और उच्चतम न्यायालय के चार न्यायाधीश समेत तमाम स्टाफ इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं। रविवार को कोविड-19 के नये वैरिएंट ओमिक्रान के 552 नए मामले सामने आए हैं। इससे संक्रमित मरीजों की कुल संख्या बढ़कर 3,623 हो गई है। महाराष्ट्र में ओमिक्रान के सर्वाधिक 1,009 मामले सामने आए हैं। दिल्ली में 513, कर्नाटक में 441, राजस्थान में 373, केरल में 333 और गुजरात में 204 मामले मिले हैं। अच्छी बात है कि जान गंवाने वालों का आंकड़ा नहीं बढ़ा है और अस्पतालों पर अभी पहले जैसा दबाव नहीं है। केंद्र सरकार लगातार राज्य सरकारों को निर्देश दे रही है।
राज्यों को भी गंभीरता दिखाने की जरूरत है। संक्रमण से उत्पन्न स्थिति और इससे निपटने की तैयारियों के मद्देनजर भविष्य की रणनीति में व्यवहारिक रुख अपनाते हुए ध्यान देना होगा कि चिकित्सा प्रणाली पर अधिक बोझ नहीं पड़े। महामारी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव में संतुलन बना रहे। ध्यान रखना होगा कि लोगों को आर्थिक, जीविकोर्पाजन और सामाजिक पहलुओं पर पाबंदी से होने वाले असर को कैसे कम रखा जाए। अधिक खतरे वाली आबादी को बूस्टर खुराक देने सहित टीककारण को जारी रखने की जरूरत है। अनिवार्य टीकाकरण जरूरी है, क्योंकि बिना टीकाकरण कराए लोग अन्य को खतरा पैदा करते हैं और अस्पताल में संक्रमण के कारण भर्ती होने पर स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव डालते हैं।
इस समय के हालात को देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि देश तीसरी लहर की आंधी की चपेट में आ चुका है। इसलिए किसी भी तरह की लापरवाही से बचना चाहिए। यह जानते हुए कि देश में स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं, हमें लापरवाही से स्वास्थ्य-तंत्र पर दबाव नहीं बढ़ाना है। जान के साथ जहान की फिक्र करनी है ताकि फिर देश में पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था न डगमगाए।
